
वनों को बचाने वाले विद्रोही नागुल दोरला की प्रतिमा होगी स्थापित
Honor the brave martyrs of Bastar: बस्तर के वीर शहीदों को सम्मान देने बस्तर आदिवासी क्षेत्र विकास प्राधिकरण ने नई पहल की है। बस्तर भूमि में ब्रितानी हुकूमत के दौरान साल वनों की कटाई पर नाराज आदिवासी जमीदारों को गोलबंद कर एक पेड़ के बदले एक सिर देने के आंदोलन ने तत्कालीन निजाम के ठेके को निरस्त करवाने वाले नागुल दोरला की आवापल्ली(BIJAPUR) में प्रतिमा स्थापित की जाएगी।
बीजापुर विधायक और बस्तर आदिवासी क्षेत्र विकास प्राधिकरण के उपाध्यक्ष विक्रम मंडावी ने कहा कि जल, जंगल, जमीन को बचाने के लिए वीर शहीदों की शहादत को भुलाया नहीं जा सकता। प्राधिकरण की बैठक में पोतकेल के वीर क्रांतिकारी नागुल दोरला के प्रतिमा को आवापल्ली में स्थापना के लिए 10 लाख रुपए की राशि स्वीकृत की गई है। इसके साथ ही आवापल्ली(BIJAPUR) के महाविद्यालय का नाम वीर क्रांतिकारी नागुल दोरला के नाम पर रखे जाने का निर्णय लिया गया है।
कौन है नागुल दोरला
ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ बीजापुर जिले के पोतकेल, कोतापल्ली और भेज्जी इलाके में 1859 में हुए आदिवासियो के पर्यावरण की रक्षा के लिए किए गए विद्रोह को कोई विद्रोह के नाम से जाना जाता है। कोई विद्रोह भारत का एक ज्ञात सफल पर्यावरण के लिए तथा जल, जंगल, जमीन को बचाने के लिए आदिवासियों के द्वारा किया गया एक विद्रोह था। जो साल वनों की रक्षा के लिए किया गया था।
एक पेड़ एक सिर का नारा
इस आंदोलन में जंगल नहीं काटने देने के लिए एक पेड़ के पीछे एक सिर कटवाने की बात कही गई थी। इसी दौरान एक पेड़ एक सिर का नारा दिया था। आंदोलन के मुख्य नेतृत्वकर्ता नागुल दोरला के नेतृत्व में आदिवासी जमीदारों के इस विद्रोह के सामने अंग्रेजों को अपने पैर पीछे खींचने पड़े साथ ही निजाम को दिए गए पेड़ काटने के ठेके को निरस्त कर दिया गया था। कोई विद्रोह ने अपनी सफलता का इतिहास रख दिया था।
दोरला समाज ने माना आभार
बस्तर आदिवासी क्षेत्र विकास प्राधिकरण की बैठक में दोरला समाज के वीर क्रांतिकारी नागुल दोराला की प्रतिमा स्थापित करने और कालेज का नामकरण किए जाने का दोरला समाज प्रमुखों ने स्वागत किया है। समाज के बसमैया अंगनपल्ली ने कहा की इससे हमारे आने वाली पीढ़ी खुद को गौरवान्वित महसूस करते रहेगी।
दोरला जनजाति की संख्या हुई कम
दक्षिण पश्चिम बस्तर क्षेत्र के सुकमा और बीजापुर में गोंड जनजाति की उपजाति कहे जाने वाले दोरा या दोरला जनजाति की संख्या में लगातार गिरावट आई है। आम तौर पर कृषि गतिविधियों का संचालन करते हैं और वन क्षेत्रों में साधारण रूप से रहते हैं और ज्यादातर निरक्षर हैं और अलौकिक शक्तियों और जादू टोना में उनका दृढ़ विश्वास है। इनके द्वारा बोले जाने वाली बोली दोरली कहलाती है जो गोंडी और तेलुगु के मिश्रित उच्चारण की होती है। दोरला समाज के कक्केम नारायण ने बताया की बीजापुर जिले में उनकी आबादी करीब 35 हजार है।
Published on:
11 Dec 2022 12:34 pm
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