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बोरवेल में गिरे कोई भी, प्रशासन को याद आते है भंवरलाल सुथार, यह है कारण

दिहाड़ी मजदूरी करके अपना गुजर बसर करने वाले भंवरलाल को अगर रेस्क्यू करने का मौका मिलता है तो वह चूकता नहीं है।
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बीकानेर

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Anushree Joshi

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Updated: 23 Nov 2017, 12:46 PM IST

bhanwarlal suthar

बोरवेल में कहीं भी कोई गिर जाए तो प्रशासन को मंडी 465 निवासी भंवरलाल सुथार याद आते हैं। वे अब तक प्रदेशभर में तीन रेस्क्यू कर चुके हैं। हालांकि जुगाड़ से बनाए गए यंत्र से एक जिंदगी को बचाया जा सका है। दिहाड़ी मजदूरी करके अपना गुजर बसर करने वाले भंवरलाल को अगर रेस्क्यू करने का मौका मिलता है तो वह चूकता नहीं है।

मिस्त्री भंवरलाल बताते हैं कि अखबारों व टीवी में आए दिन बोरवेल में बच्चों के गिरने की खबरें पढऩे व सुनने को मिलती थी। सोचता था कि बोरवेल में गिरे बच्चों को बचाने के लिए कोई सटीक उपाय करना चाहिए। बोरवेल को खोदना और मिट्टी निकालने तक जान जाने की गुंजाइश ज्यादा रहती है। इसी सोच के साथ कुछ अलग करने की सोची।

इस बीच, पांच नवंबर 2008 को छत्तरगढ़ तहसील के लाखनसर गांव के पास दो आरएम में राहूराम सांसी के खेत में मांगीलाल मेघवाल का चार साल का बेटा बोरवैल में गिर गया। बच्चे को निकालने के लिए पूरा प्रशासनिक अमला लगा हुआ था।

भंवरलाल बताते हैं कि वह भी वहां गया और उसने प्रशासनिक अधिकारियों से बच्चे को बचाने का एक मौका देने की गुजारिश की। बच्चे की जिंदगी के लिए सभी ने हामी भर ली। मौके पर ही जुगाड़ बनाया और बोरवेल में डालकर घंटेभर बाद ही बच्चे को सुरक्षित बाहर निकाल लिया।

नाम पड़ गया 'जिंदगी का जुगाड़'
भंवरलाल अब तक तीन रेस्क्यू कर चुके हैं। तीन में से दो में बोरवेल में गिरे बच्चे जिंदगी हार गए जबकि लाखनसर में बच्चे को बचाया जा सका। इस जुगाड़ को बनाने में भंवरलाल को एक से डेढ़ घंटा लगता है। लोहे के सरियों तथा पत्तियों से बेलनाकार पिंजरा तैयार किया गया।

पिंजरे के दोनों तरफ एक रस्सी बांधी जाती है तथा एक रस्सी पिंजरे के नीचे बांधी जाती है ताकि बच्चे के पैर में वह फंस जाए। इसके बाद सीसीटीवी कैमरे की मदद लेकर बच्चे को निकालने की कोशिश की जाती है। लाखनसर में प्रकाश को बोरवेल में से जिंदा निकालने के बाद इस जुगाड़ को नाम दिया गया 'जिंदगी का जुगाड़'।