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ईसर की मनुहार, चित्रों में सज रहे मन के भाव

गणगौर पूजन उत्सव- घर-घर हो रहा मां गवरजा का पूजन बालिकाएं गीतों से कर रही ईसर की मनुहार

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ईसर की मनुहार, चित्रों में सज रहे मन के भाव

ईसर की मनुहार, चित्रों में सज रहे मन के भाव

बीकानेर. धुलंडी से शुरू हुआ गणगौर पूजन उत्सव धीरे-धीरे परवान चढ़ रहा है। सुबह घरों की छतों पर गणगौरी गीतों की गूंज के साथ बालिकाएं व युवतियां मां गवरजा का पारम्परिक रूप से पूजन कर रही है। मिटटी के पालसिए में रखी होलिका दहन की राख से बनी पिंडोलियों का अबीर, गुलाल, इत्र आदि से पूजन कर अच्छे वर और अच्छे घर की कामना कर रही है। पूजन के दौरान बालिकाएं सामूहिक रूप से मां गवरजा के पारम्परिक गणगौरी गीतों का गायन करने के साथ-साथ अबीर, गुलाल, सफेद मिटटी से चित्र बनाकर अपने भावों को भी अभिव्यक्त कर रही है। वहीं गीतों के माध्यम से गवरजा के श्रृंगार का वर्णन करने के साथ ईसर की मानु मनुहार का दौर भी चल रहा है।

उकेर रही चित्र

गणगौर पूजन के दौरान बालिकाएं अपने मन के भावों को चित्रों के माध्यम से उकेर रही है। इन चित्रों में विभिन्न प्रकार की गुलाल से रंग भरकर मन की कल्पनाओं को चित्रों के माध्यम से रख रही है। गणगौर पूजन के दौरान बालिकाएं प्रकृति की सुंदरता, फूल,पत्तियां, सूर्य, चन्द्रमा, गवरजा के पगलिए, स्वास्तिक, रेल, बस, भौतिक सुख सुविधाओं के साधन, गवर-ईसर, मकान, झोंपड़ी, खेत, पहाड़ सहित विभिन्न प्रकार के चित्र बनाकर उनको गुलाल से सजाया जा रहा है।

सुख -समृद्धि की कामना

गणगौर पूजन के पारम्परिक गीतों के माध्यम से बालिकाएं अपने घर-परिवार की सुख समृद्धि की कामनाएं कर रही है। वहीं अपने परिवार के सदस्यों के नाम लेकर उनके लिए मंगल कामनाएं भी कर रही है। मां गवरजा को अपनी बहन मानकर पूरे मनोयोग के साथ पूजन कर रही है। जबकि ईसर को अपना जीजा मानकर गीतों के माध्यम से हंसी-ठिठोली करने के साथ मान-मनुहार भी कर रही है। पूजन उत्सव के आगामी दिनों में बासा देने के दौरान भी बालिकाएं ईसर के समक्ष विभिन्न पकवानों का भोग अर्पित कर मान मनुहार करेंगी।

गवर गवरादे माता खोल किवाड़ी...

गणगौर पूजन के दौरान बालिकाएं उठी -उठी गवर नींदाड़ो खोल, गवर गवरादे माता खोल किवाड़ी, बाडी वाला बाड़ी खोल, ऊंचा हे मां घरवास, ईशरदासजी रा धोळा माण्डणियां, ऊंचो चवड़ो चौंखूटा, बाग में पपैया बोले, ऐ काले-पीले पोमचा ऐ, ईसरदासजी कद आयसी, कालो भाटो कांकरो, चम्पे री डाली हींडो मोंडयो, चमकण घाघरों, म्हारी बाड़ी-बाडी भंवरों भणकै, केसर कुंकु भरी रे तलाई, इये चूंदडली रो म्हारी गवरजा बाई ने कोड सहित कई पारम्परिक गीतों का गायन कर रही है। वहीं म्हारी चांद गवरजा, गढ़न हे कोटो सूं गवरल ऊतरी, खेलण दो गणगौर आदि गीतों का गायन भी चल रहा है।