20 जनवरी 2026,

मंगलवार

Patrika LogoSwitch to English
icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

धोरों की धरती का अमृत तुल्य फल देशी मतीरा विलुप्ति की कगार पर

धोरों की धरती का अमृत तुल्य फल देशी मतीरा विलुप्ति की कगार पर

2 min read
Google source verification
धोरों की धरती का अमृत तुल्य फल देशी मतीरा विलुप्ति की कगार पर

धोरों की धरती का अमृत तुल्य फल देशी मतीरा विलुप्ति की कगार पर

सोहनलाल सारस्वत

हेमेरां. दियाळी रा दिया दीठा, काचर बोर मतीरा मीठा। खुपरि जाणे खोपरा, बीज जाणे हीरा। बीकाणा थारे देश में, मोटी चीज मतीरा। यह लोकोक्ति ग्रामीण क्षेत्र में प्रचलित है, लेकिन रेगिस्थान की धरती का अमृत फल देशी मतीरा अब लुप्त होने के कगार पर पहुंच गया है। धोरा धरती का यह बेशकीमती मिश्री जैसा फळ गायब होता जा रहा है। वैसे तो कमोबेश बीकानेर संभाग में ही मतीरे का उत्पादन होता है, लेकिन बीकानेर जिले में यह सर्वाधिक उत्पादित होता था। बीकानेर के भण्डान क्षेत्र का मतीरा प्रसिद्ध होता था और प्रचुर मात्रा में होता था, लेकिन गत 15 वर्षों से खेतों में मतीरे की बेलें उगती है लेकिन या तो स्वयं ही जल जाती है या फिर उसके लगने के साथ मतीरों का खराब होना शुरू हो जाता है, जो थोड़े पकने तक पहुंचते हैं। उनमें वह स्वाद विकसित नही हो पाता है। गौरतलब है कि बीकानेर में कृषि विश्वविद्यालय है। यहां कृषि अनुसन्धान पर एक बड़ी राशि प्रति वर्ष जारी होती है। शुष्क क्षेत्र में अनुसंधान करने वाली संस्था काजरी की भी यहां अनुसंधानशाला है, लेकिन कभी चिंता ज़ाहिर की गई है कि मतीरे को कौनसा रोग लग गया।

मतीरा को वनस्पति विज्ञान की भाषा में सिट्रलस लैनेटस कहते हैं। पश्चिमी राजस्थान की आबोहवा ने इसमें तरबूज से नितांत भिन्न गुण पैदा कर दिए हैं। तरबूज को काटकर रख सकते है। वह बाहर की हवा के प्रभाव से बेस्वाद नही होता है। जबकि मतीरा काटते ही कुछ देर बाद स्वाद बदल लेता है। इसका कारण है मतीरे में पाए जाने वाले लोहे की मात्रा के कारण होता है। यह होली के बाद उगाया जा सकता है लेकिन इसका वास्तविक स्वाद दीपावली के आसपास ही उभरता है।

औषधीय गुण से भरपूर

अपच, कब्ज, पीलिया आदि में मतीरा रामबाण औषधि रहा है। गुर्दे और पेशाब प्रवाह का संतुलन स्थापित करने में मतीरा बेजोड़ है। लोह की उपस्थिति के कारण यह होमोग्लोबिन स्तर में वृद्धि करता है।