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कभी नगर की प्यास बुझाते थे ६१ कुएं, अब समय ने किया लुप्त

कई कुओं का इस्तेमाल जलदाय विभाग ने वर्षों तक किया, अब लगभग सभी कुएं बंद, कई का अस्तित्व ही समाप्त

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कभी नगर की प्यास बुझाते थे ६१ कुएं, अब समय ने किया लुप्त

कभी नगर की प्यास बुझाते थे ६१ कुएं, अब समय ने किया लुप्त

बीकानेर। जीवन के लिए सबसे अधिक महत्व जल का है। विश्व में कहीं भी जाएं, जहां जलाशय हैं वहीं स यताएं पनपी। चाहे नदियां हों या झील, तालाब। यहां तक वनों में भी जंगली जीव जलाशयों के आसपास ही रहते हैं। कालांतर जैसे-जैसे स यता विकसित होती गई वैसे-वैसे जलस्रोत भी बनाए जाने लगे। इनमें बावडिय़ां, कुएं, पोखर, सरोवर ने महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन किया और आज भी कर रहे हैं। जल के महत्व का वेदों व पुराणों में बहुत वर्णन किया गया है।


बीकानेर में कुओं की शुरुआत
हमारे देश में कुओं का ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक महत्व अधिक रहा है। ये सिर्फ पेयजल का स्रोत ही नहीं रहे बल्कि सामाजिक व धार्मिक क्रिया कलापों में भी इनका विशेष स्थान रहा है। बीकानेर की बात करें तो इस थार मरुस्थल में कुएं ही मु य रूप से जलस्रोत रहे हैं। रियासतकाल में वर्षा कम होने के कारण पोखर-तालाओं में पानी इतना उपलब्ध नहीं हो पाता था कि जितना चाहिए। निरंतर बढ़ती जनसं या एवं अकाल के कारण यहां मानव एवं पशुओं दोनों की हानि होती थी। इस स्थिति में भूमि दोहन से जल निकालने की आवश्यकता महसूस हुई। बीकानेर नगर में कुओं के बारे में गहन अध्ययन करने वाले लेखक संजय श्रीमाली ने बताया कि यहां पर संवत १७०० के बाद आबादी वाले स्थानों पर कुओं का निर्माण प्रारंभ हुआ। इस घोर मरुधरा में कुएं ही ऐसे जल स्रोत थे कि वे वर्ष पर्यंत पेयजल उपलब्ध करा सकते थे।

शनै:शनै: यहां राज परिवार के साथ सेठ साहूकारों, साधुओं सहित भिन्न-भिन्न जाति के लोगों ने कुओं के निर्माण में योगदान किया। उन दिनों पानी का मूल्य भी अधिक था। महाराज गंगासिंह के काल में एक पैसे में एक घड़ा पानी मिलता था। इसमें २५ लीटर पानी आता था। इससे बीकानेर में पानी के महत्व का पता चलता है। आबादी बढऩे के साथ सन् १९४३ में महाराजा सार्दुल सिंह के शासन में निशुल्क जल सेवा योजना आरंभ की गई। प्रत्येक मोहल्ले में सार्वजनिक पानी के स्टैण्ड लगाए गए। गांव-गांव में कुएं खुदवाए गए। कुओं पर पंप लगाए गए जिससे पानी शहर को वितरित किया जाने लगा। उस समय तक शहर में६१ कुएं हुआ करते थे। धीरे-धीरे इनका जलस्तर घटता गया और बंद होते चले गए। जलदाय विभाग ने भी इनका काफी दोहन किया। वर्तमान में पूरे शहर में नहर का पानी सप्लाई किया जा रहा है।


संजय श्रीमाली ने अपनी पुस्तक जल-धरातल से जमीन तक में शहर के कुओं के निर्माण, निर्माण काल और कहां पर हैं इसका विस्तृत वर्णन किया है। कई वर्ष के परिश्रम के बाद उन्हेंाने इस संबंध में सामग्री जुटाई। उनका कहना है कि अधिकांश लोगों विशेषकर युवा पीढी को इस बारे में जानकारी हीनहीं है।


ये हैं शहर के कुएं
अलख सागर-यह कुआं कोयला गली के पास है। इसका निर्माण विक्रम संवत १९०१ में अलखियां स प्रदाय के प्रमुख लालगिरि ने करवाया। यह विसं.१९२२ में पूर्ण हुआ। अनोपसागर या चौतीणा कुआं- इस कुएं का निर्माण महाराजा अनूप सिंह ने कराया। इसके चारों ओर सारण होने के कारण यह चौतीणा कुआं से जाना गया। ब तावर सागर कुआं-यह कुआं रामपुरिया कॉलेज के पीछे है। इसका निर्माण संवत १७७५ में राव ब तावर सिंह मोहता ने कराया। चनण सागर कुआं-चंदन सागर मोहल्ले में स्थित हे। इसका निर्माण महाराजा राजसिंह की पत्नी रानी चनण कंवर ने संवत १९०१ में कराया। घेरूलाल व्यास कुआं- यह जस्सोलाई तलाई के पास है। इसका निर्माण घेरूलाल व्यास ने संवत १८८७ में कराया।

वेणीसर कुआं- संवत १८०० में आचार्यों के चौक के पास वेणीदत्त ने कराया। जसवंत सागर कुआं- यह जस्सूसर गेट के पास है। इसका निर्माण महाराजा अनूपसिंह के कार्यकाल में माहेश्वरी जाति के राठी वंश के जसवंत राठी के पुत्रों ने कराया था। भुट्टों का कुआं-भुट्टों के बास में इसका निर्माण राजपरिवार ने १७६५ में कराया। इसका नाम सेखावत कुआं भी है। मोहता धर्मशाला कुआं- रेलवे स्टेशन के सामने मोहता धर्मशाला में सन्१९१६ में मोहता मोतीलाल के परिवार ने कराया। अमरसर कुआं-अमरसिंह पुरा में माली जाति के शेरजी गहलोत ने खुदवाया। आनंद सागर कुआं-भीनासर में संवत २००१ के बाद सेठ चंपालाल बांठिया ने अपनी पत्नी आनंदकंवर की स्1ृति में बनाया। बांठिया कुआं- यह कुआं भी भीनासर में सेठ चंपालाल बांठिया ने खुदवाया। बल्लभ सागर कुआं- इसका निर्माण व्यास बल्लभ सागर ने कराया।

यह जस्सोलाई तलाई के पास है। रघुनाथ सागर- इस कुआं को रघुनाथजी ने संवत १८१४ में बनवाया। जीतुजी का कुआं-गंगाशहर में स्थित कुआं ईसरचंद तोलाराम चौपड़ा ने कराया। करमीसर कुआं- यह संवत १८७९ में कीकाणी व्यास पंचायत की तरफ से बनाया। रामसागर कुआं- श्रीरामसर में विक्रम संवत १९९२ में इसका निर्माण किया गया। मदनमोहन सागर कुआं- मूंधड़ों की बगीची में स्थित यह कुआं संवत१९५५ में नरसिंहदास मूंधड़ा ने बनाया। कोठरिया कुआं।-उस्तों की बारी के बाहर उत्तमचंद कोठारी ने सं.१९७६ में बनाया। मोहता कुआं- जनता प्याऊ के पास सन १९३२ में बलदेव दास मोहता परिवार ने बनवाया। नया कुआं- इस कुएं का नाम आनंद विजय सागर भी है। इसका निर्माण राजपरिवार ने संवत १८०५ में कराया। लालेश्वर सागर कुआं- संत १९३७ में महाराजा डूंगर सिंह ने बनवाया। जूनागढ़ किले में चार कुएं बने हुए हैं।

इनमें रानीसर कुआं-जूनागढ़ स्थित कुएं का निर्माण महाराजा रायसिंह की पत्नी माहारानी गंगा ने कराया। इसके साथ कल्याण सागर, रामसर कुआं एवं गजसागर कुआं हैं। करणीसागर-लालगढ़ पैलेस में करणीसागर नाम के दो कुएं हैँ। यह १९०२ ईस्वी में बनवाए गए। मोहता कुआं- सांसोलाव तालब के पास संवत १९५६ में हरिकिसनदास ने बनाया। डागा कुआं-सोनगिरी में स्थित कुएं का निर्माण सेठ नृसिंहदास डागा ने कराया। बछावतों का कुआं-रागणी चौक में स्थित कुआं का निर्माण १६५७ई में हुआ। इसे मंत्री कर्मचंद बछावत ने कराया। मोदियों का कुआं-गोपेश्वर बस्ती के पास है। मोदी सुलतानमल मल ने संवत १७५३ में बनाया। जगमण कुआं- डीडू सिपाहियों की मस्जिद के पास जगमणदास व्यास ने संवत १९११ में बनाया। केशेराय कुआं- हमालों की बारी के बाहर संवत १८३३ में केशोराय कल्ला ने कराया। खंडिया कुआं- रघुनाथसर कुएं के पास संपतलाल कीकाणी परिवार ने कराया। खारया कुआं- सारड़ा व भट्टड़ परिवार ने इसे गंगाशहर स्थित मालियों के मोहल्ले में बनाया।

सागरिया कुआं- लालेश्वर मंदिर शिवबाड़ी में स्थित कुआं महाराजा अनूपसिंह के राज्यकाल में बना। प्रतापमल बैद कुआं-दीवान प्रतापमल बैद ने संवत १८९२ में बनवाया जो लुप्त हो चुका है। मुरली मनोहर कुआं-महाराजा रतनसिंह की माता ने संवत १९०० के आसपास बनाया। भीनासर में स्थित है। शलमनाथ कुआं- सुजानदेसर में सालमनाथ धोरे पर है। संवत २००२ में बना। धरणीधर कुआं- धरणीधर ने श्रीरामसर में बनावाया। छोगजी का कुआं- जूनागढ़ के पास संवत १९५६ में व्यापारी छोगाराम ने बनवाया। जैलवेल कुआं- जैलवैल मोहल्ला में सन १८९१ में महाराजा गंगासिंह ने कराया। रतनसागर कुआं- फड़ बाजार के पास १८५० ई. में महाराजा रतन सिंह ने कराया। कस्तुरचंद डागा कुआं-पूगल रोड पर सेठ कस्तूरचंद डागा ने बनवाया। रामनाथ डागा कुआं- पूगल रोड पर रामनाथ डागा ने कराया। सोनगिरी कुआं- सन१७३५ में महाराजा जोरावर सिंह की पत्नी रानी सोनगरा के नाम से बनाया गया। नथानियों का कुआं-यह नत्थूसरबास क्षेत्र में यह स्थित है।

नवलसागर कुआं- जूनागढ़ के पास माजीसा के बास में संवत १९५० में खुदवाया गया। महानंदजी कुआं- शहर के पश्चिमी भाग में परकोटे के बाहर है। राणीसर कुआं-पुलिस लाइन के पास बना हुआ है। पुराना कुआं- सुजानदेसर में बना है। कृष्णा वैल- यह करणी सिंह स्टेडियम के सामने स्थित यहै। पंडितों का कुआं- सुजानदेसर में है। अस्ताचल कुआं- रथखाना मोहल्ले में है। सेठ चांदमल कुआं- यह सुजानदेसर-गंगाशहर रोड पर सेठ चांदमल ढढ्ढा ने कराया। फूलबाई कुआं- जोशीवाड़ा में यह कुआं स्थित है। पंववारसर कुआं- पंवारसर मोहल्ले में बना हुआ है। पितरासयो कुंआ- गंगाशहर में चांदमल बाग के पास है। केसरदेसर कुआं-राणीसर बास में है। चौतीणा कुआं-मिनर्वा के पास है। बृजलाल व्यास कुआं-जस्सोलाई के पास है। गौरेजी कुआं करमीसर में, मेहताब सागर कुआं, मंडलावतों का कुआं भी थे। ये लुप्त हो चुके हैं।