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मिट्टी की ठंडी तासीर…फ्रिज नहीं, अब मटकी वाला पानी

-गर्मी बढ़ने के साथ ही बढ़ी मटकी की बिक्री  

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मिट्टी की ठंडी तासीर...फ्रिज नहीं, अब मटकी वाला पानी

मिट्टी की ठंडी तासीर...फ्रिज नहीं, अब मटकी वाला पानी

बीकानेर. गर्मी में फ्रीज की जगह घरों में मटकी वाले ठंडे पानी पीने का चलन लौट आया है। धीरे-धीरे चलन से गायब हो रही मिट्टी की मटकी कोरोना काल के बाद ज्यादा उपयोग में ली जाने लगी हैं। वैसे तो हर क्षेत्र में कुम्भकार अपने आस-पास की मिट्टी से मटकी तैयार करते है। वह सस्ती भी तैयार हो जाती है और मटकी को एक से दूसरे स्थान पर ले जाने में टूटने का खतरा भी नहीं रहता है। अब यह ट्रेंड बदला है। बीकानेर में जोधपुर, जैसलमेर, पोकरण में बनी मटकियां भी बेची जा रही है। लोग अपनी जरूरत और बजट के हिसाब से खरीद रहे है।

लोग रात के समय मटकी को पानी से भरते है। जो सुबह दिनभर उपयोग के लिए ठंडा मिलता है। कुछ लोग मटकी के ऊपर गिला कपडा लगाकर रखते है। अब घरों में मेहमान को पानी देते समय फ्रीज का लेंगे या मटकी का..., यह पूछने का ट्रेंड भी देखने को मिलने लगा है। जिन लोगों को बर्फ से एलर्जी रहती है, जुकाम हो जाता है। वह भी ठंडे पानी से गला तर करने की हसरत मटकी के पानी से पूरी करते है। जोधपुर व जैसलमेर की मटकियों में टोंटी भी लगी होती है। कुछ पर खूबसूरत दिखाने के लिए रंग से मांडणे भी बनाए जाते है।


नापासर की मटकी बेहतर

नापासर से प्रदेश के कई जिलों में मटकियां भेजी जाती है। सबसे ज्यादा राजगढ़, चूरू, फतेहपुर, झुंझुनूं व सीकर जिलों में मटकी भेजी जाती है। स्थानीय लोग भी नापासर की मटकी की मांग करते है। नापासर में करीब 15 से 20 कुम्भकार परिवार मटकियां बनाने का काम करते है। इसमें तीन प्रकार की मिट्टी (कोलायत, लखासर और नापासर) को मिलाकर चाक से मटकी का आकार देते है।

महाजन की पहुंच पंजाब- हरियाणा
महाजन की मटकियां संभाग के साथ पंजाब व हरियाणा में भी भेजी जाती है। गर्मी के इस मौसम में बीकानेर-श्रीगंगानगर हाइवे से गुजरने वाले वाहन चालक महाजन में मटकियां खरीदकर अपने साथ ले जाते है। स्थानीय लोगों से उनके पंजाब-हरियाणा में रहने वाले रिश्तेदार यहां की मटकियों की फरमाइश करते है। महाजन कस्बे के कुम्भकारों के बास में करीब डेढ़ दर्जन परिवार मटकियां बनाते है। कुछ ठेकेदार भी यहां की मटकियां सूरतगढ़, पीलीबंगा, श्रीविजयनगर व लूणकरनसर के बाजार में ले जाकर बेचते है। करीब तीन दशक से मटकी बना रहे धन्नाराम कुम्हार बताते है कि इस क्षेत्र की मिट्टी की तासीर ठण्डी होने से मटकियों में पानी फ्रीज जैसा ठण्डा रहता है। सर्दी के मौसम में पकाई मटकियों में पानी ज्यादा शीतल रहता है।


पानी रहता है ठंडा

पिछले 30 वर्षों से श्रीगंगानगर चौराहे पर मटकियां बेच रही हूं। सीजन में मटकियों की अच्छी बिक्री रहती है। यहां पर जैसलमेर, पोकरण और जोधपुर की मटकियां भी आ रही है। बीकानेर में बनी मटकियों का पानी ठंडा रहता है। इनकी मिट्टी की मोटाई भी दूसरी जगह की मटकियों के मुकाबले पतली है। गंगाशहर में कई परिवार मटकियां तैयार कर बेचते है।

जेठी देवी, कुम्भकार

जानिए मटकियों की विशेषता
जोधपुर की मटकी

- सबसे महंगी मिलती है। दूर से परिवहन कर लाने का खर्च, रास्ते में टूट-फूट के चलते लागत बढ़ जाती है।
- यह मिट्टी की मोटी परत की बनी होती है। फिनिशिंग ज्यादा आती है। देखने में खूबसूरत होती है।

- पानी देरी से ठंडा होता है लेकिन देर तक ठंडा रहता है। पानी रात को भरते है, अगले दिनभर ठंडा रहता है।


जैसलमेर व पोकरण की मटकी

- यह अपेक्षाकृत कम कीमत पर मिल जाती है। हालांकि इसे भी बेचने में मूल कीमत से ज्यादा खर्च आता है।
- यह मटकियां ज्यादातर बड़े आकार की होती है। सार्वजनिक प्याऊ आदि पर रखने के लिए ज्यादा काम लेते है।

- पानी जल्दी ठंडा हो जाता है, लेकिन लू आदि चलने पर ज्यादा देर तक शीतलता नहीं रहती।


महाजन व नापासर की मटकी

- मिट्टी की पतली परत की बनी होती है। स्थानीय होने से अपेक्षाकृत कुछ सस्ती मिल जाती है।
- पानी एक बार ठंडा हो जाने के बाद देर तक रहता है। ज्यादातर कुम्भकार सर्दी में इसे पकाते है।

- यह छोटे, मध्यम और बड़े तीनों आकार में मिल जाएगी। जिलेभर में इसकी मांग ज्यादा रहती है।