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यहां मिट्टी से बनता है ताजिया, जहां होता है तैयार, वहीं होता है ठंडा

बीकानेर में देश का इकलौता ऐसा ताजिया भी तैयार होता है, जो जहां बनता है, उसे उसी स्थान पर ठंडा भी किया जाता है। यह ताजिया कच्ची ईंट, पीओपी से बनता है। इस ताजिये पर उस्ता शैली में कलात्मक चित्रकारी भी की जाती है।

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यहां मिट्टी से बनता है ताजिया, जहां होता है तैयार, वहीं होता है ठंडा

यहां मिट्टी से बनता है ताजिया, जहां होता है तैयार, वहीं होता है ठंडा

विमल छंगाणी

हजरत इमाम हुसैन की याद में मोहर्रम की नौंवी व दसवी तारीख को ताजियों की जियारत का दौर चलता है। दसवीं तारीख की शाम ताजियों को विभिन्न कर्बलाओं में ठंडे किए जाते हैं। बीकानेर में रियासतकाल से विभिन्न शैलियों में कलात्मक ताजिये बनाने की परंपरा है। बीकानेर में देश का इकलौता ऐसा ताजिया भी तैयार होता है, जो जहां बनता है, उसे उसी स्थान पर ठंडा भी किया जाता है। यह ताजिया कच्ची ईंट, पीओपी से बनता है। इस ताजिये पर उस्ता शैली में कलात्मक चित्रकारी भी की जाती है। करीब एक सप्ताह में यह ताजिया बनकर तैयार होता है।

एक सप्ताह, 30 कारीगर

डीडू सिपाहियान मोहर्रम कमेटी के अध्यक्ष खुदा बख्श के अनुसार कच्ची ईटों व पीओपी से इस ताजिये को बनाने का कार्य मोहर्रम की दूसरी तारीख से प्रारंभ होता है। मोहर्रम की नौंवी तारीख तक यह बनकर तैयार होता है। करीब 30 कारीगर, मजदूर और पेंटर इस ताजिये को तैयार करते हैं। वहीं पूरे मोहल्ले और समाज के लोगों का इसमें सहयोग रहता है।

10 फीट ऊंचा,4 फीट गोलाई

मोहर्रम कमेटी के संरक्षक डॉ. अब्दुल शमद के अनुसार, डीडू सिपाहियान मोहल्ले में मिट्टी-पीओपी से बनने वाले ताजिये की ऊंचाई लगभग 10 फीट और गोलाई लगभग 4 फीट होती है। ताजिये पर कलात्मक रूप से उस्ता शैली में बारीक चित्रकारी भी की जाती है। इस ताजिये को जहां बनाया जाता है, उसी स्थान पर ठंडा किया जाता है। दशकों से यह परंपरा चल रही है।

अखाड़े का प्रदर्शन, जियारत का दौर

मोहर्रम की नौंवी व दसवी तारीख को मिट्टी से बनने वाले ताजिये की मोहर्रम चौकी के पास अखाड़े का आयोजन होता है। बच्चों से बुजुर्ग तक अखाड़े में हैरत अंगेज प्रदर्शन करते हैं। यहां मुस्लिम समाज ही नहीं, हिन्दू समाज के परिवार भी ताजिये का दर्शन कर प्रसाद अर्पित करते हैं और मन्नते मांगते हैं। छोटे बच्चों के उत्तम स्वास्थ्य की कामना को लेकर ताजिये के नीचे से भी निकालते हैं। मोहर्रम के आयोजन में कौमी एकता की मिसाल देखने को मिलती है।