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मिट्टी की काया में कमजोरी से सफेद मूंगफली पर काली छाया

दो साल के दौरान सफेद मूंगफली पर काली टिक्की रोग का प्रकोप तेजी से बढ़ा है। इसकी कृषि वैज्ञानिकों ने गहराई से पड़ताल की तो मिट्टी की काया के कमजोर होने का कारण उभरकर सामने आया है। मूंगफली के गोटे के मध्य काली टिक्की बनने से विदेशों में मांग घट गई है। इसके चलते इस बार सीजन में निर्यात बहुत कम हुई है।

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प्रदेश में मूंगफली उत्पादन में सिरमौर बीकानेर क्षेत्र में कृषि भूमि में पोषक तत्वों की कमी का असर गुणवत्ता पर दिखने लगा है। दो साल के दौरान सफेद मूंगफली पर काली टिक्की रोग का प्रकोप तेजी से बढ़ा है। इसकी कृषि वैज्ञानिकों ने गहराई से पड़ताल की तो मिट्टी की काया के कमजोर होने का कारण उभरकर सामने आया है। मूंगफली के गोटे के मध्य काली टिक्की बनने से विदेशों में मांग घट गई है। इसके चलते इस बार सीजन में निर्यात बहुत कम हुई है। बीकानेर जिले की अनाज मंडियों में 70 लाख क्विंटल मूंगफली सीजन में आती है। करीब बीस लाख क्विंटल का किसानों से सीधा व्यापार और बाजार में रिटेल में बिक्री में चली जाती है। दीपावली के बाद सीजन में अनाज मंडियों में मूंगफली की आवक एक लाख बोरी तक पहुंच जाती है। इन दिनों मूंगफली की बुवाई चल रही है। ऐसे में मूंगफली क्षेत्रीय अनुसंधान केन्द्र ने किसानों को मूंगफली की बुवाई सही तरीके से करने की सलाह दी है। बीज बोने से पहले बुवाई, मिट्टी पलटने और पोषक तत्वों की पूर्ति करने पर मूंगफली में काले टिक्के से छुटकारा मिल सकता है।

मिट्टी में बोरॉन पोषक की कमी बड़ा कारण

वैसे तो मिट्टी में कई तरह के पोषक तत्व होते हैं। इन सभी तत्वों के सामंजस्य से ही कोई भी फसल गुणवत्ता लिए होती है। वर्तमान में जमीन में बोरॉन पोषक तत्व की कमी से काली टिक्की (होलो हार्ट) की समस्या सामने आ रही है। हालांकि इसका असर तेल की मात्रा पर नहीं पड़ता। परन्तु काली टिक्की वाली मूंगफली खाने में खारेपन का अहसास करवाती है। ट्यूबवेल से सिंचाई, फसल चक्र की अनदेखी कर एक ही फसल को बार-बार बोने, पोषक तत्वों को मिट्टी में नहीं डालने से भूमि में बोरॉन तत्व की कमी हो रही है।

यह सूक्ष्म तत्व भी महत्वपूर्ण

फसल उत्पादन के लिए बोरॉन के साथ-साथ नाइट्रोजन, फोसफोरस, पोटाश, कैल्शियम, आयरन, जिंक, मैग्निशियम आदि तत्व सूक्ष्मतम है। इन सभी तत्वों में बोरॉन पोषक तत्व महत्वपूर्ण माना जाता है। प्रदेश में मूंगफली के कुल उत्पादन का चालीस फीसदी अकेले बीकानेर जिले में होता है। यहां से महानगरों में मूंगफली जाती है। गोटा व तेल की इंडस्ट्री भी यहां लगी है। खासकर सिकाई की मूंगफली पंजाब, दिल्ली और हरियाणा में जाती है। काली टिक्की से मूंगफली के निर्यात और मांग पर असर पड़ा है।

बुवाई के समय पोषक तत्व करें पूरा
मूंगफली उत्पादन और मिट्टी में बोरॉन की कमी के कारण काली टिक्की की समस्या होने लगी है। राजस्थान के शुष्क क्षेत्रों की रेतीली मिट्टी में पोषक पदार्थ कि मात्रा कम होने में बोरॉन की कमी व्यापक रूप से सामने आई है। बोरॉन की कमी के लक्षण आमतौर पर नई पतियों पर दिखाई पड़ता है। इससे पौधे का विकास अवरुद्ध हो जाता है। बोरॉन की कमी को दूर करने के लिए बॉरेक्स और बोरिक एसिड उपयोग किए जाने वाले उर्वरक हैं। इनका भूमि में प्रयोग सबसे प्रभावी साबित होता है। बोरेक्स 10 किग्रा प्रति हेक्टेयर बुवाई के समय डालने अथवा बोरिक एसिड का 0.1 प्रतिशत जलीय घोल बनाकर खाड़ी फसल पर 40 और 70 दिन की होने पर छिडकाव करने से फायदा होता है। मिट्टी में बोरॉन के स्तर का पता लगाने के लिए किसान मिट्टी की जांच अवश्य करवा लेंवे।

गुजरात पड़ रहा भारी

गत सीजन की अपेक्षा इस बार मूंगफली का निर्यात विदेशों में पचास प्रतिशत ही रह गया। मूंगफली में काली टिक्की का दाग होने से ज्यादातर आयात करने वाले व्यापारी राजस्थान की जगह गुजरात से मूंगफली खरीद कर रहे है।

राजेश जिंदल, मूंगफली निर्यातक