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चीनी वैज्ञानिकों ने उष्ट्र अस्पताल विकसित करने में मांगा सहयोग

सेमीनारों में दुनिया भर के वैज्ञानिकों ने ऊष्ट्र रोग अनुसंधान और रोगों पर राजूवास के वैज्ञानिकों के कार्यों की सराहना की।

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ऊंट

बीकानेर . चीन और पेरिस में उष्ट्र रोगों और अनुसंधान पर हुई दो अलग-अलग सेमीनारों में दुनिया भर के वैज्ञानिकों ने ऊष्ट्र रोग अनुसंधान और रोगों पर राजूवास के वैज्ञानिकों के कार्यों की सराहना की। चीन स्थित इनर मंगोलिया इंस्टीट्यूट ऑफ कैमल रिसर्च के निदेशक ने भारतीय वैज्ञानिकों के दल से चीन में राजूवास के पैट्रर्न पर उष्ट्र अस्पताल विकसित करने में सहयोग मांगा है।

इस मु²े पर भारतीय वैज्ञानिकों के साथ इस संस्थान के वैज्ञानिकों की वहां विशेष बैठक रखी गई। इस बैठक में उष्ट्र रोग अनुसंधान एवं उपचार पर संयुक्त रूप से काम करने का प्रस्ताव रखा गया। इस टीम में राजूवास के उष्ट्र शल्य चिकित्सा विशेषज्ञ डॉ. टी.के. गहलोत, डॉ. प्रवीण विश्नोई और डॉ. अनिल विश्नोई शामिल थे। चीन में उष्ट्र रोग और अनुसंधान पर अन्तरराष्ट्रीय सेमीनार 22 से 26 सितम्बर तक थी।

इसमें 26 देशों के 450 वैज्ञानिकों ने शिरकत की। राजूवास के डॉ. टी.के. गहलोत ने बताया कि राजूवास में ऊंटों की शल्य चिकित्सा एवं आंखों की चिकित्सा के बारे तीन सौ स्लाइड दिखाई गई। जिसमें बीकानेर राजूवास में स्थित ऊंटों का ऑपरेशन थियेटर, सीटी स्केन मशीन, डिजिटल एक्स रे, ट्रेविश, आउट डोर समेत अस्पताल की अत्याधुनिक सुविधाएं दिखाई गई।

दुनिया भर से आए वैज्ञानिकों ने सेमीनार में माना कि राजूवास स्थित उष्ट्र अस्पताल दक्षिण एशिया का सबसे बड़ा अत्याधुनिक सुविधाओं से सम्पन्न अस्पताल है। इससे पहले पांच सितम्बर को पेरिस में हुई सेमीनार में भी भारत के काम की सराहना की गई।

चीन में दो कुबड़े के 4 लाख 50 हजार ऊंट थे। उपयोगिता कम होने से घटकर 50 हजार रह गए। इस पर चीनी सरकार ने ऊंटों पर ध्यान दिया। ऊंटों के दूध के उत्पाद, बाल और खाळ के उत्पाद बनाने का कार्य मशीनीकृत किया गया। ऊंट का दूध और मांस उत्पादन से भी जोड़़़ा गया।

ऊट से होने वाले उत्पादों को अन्तरराष्ट्रीय मानक बनाया गया। आज चीन में वापस ऊंटों की संख्या बढ़कर तीन लाख हो गई है। सरकार का ऊंट पालकों को समर्थन मिलने से यह संख्या तेजी से बढ़ रही है।
डॉ. टी.के. गहलोत , ऊष्ट्र वैज्ञानिक राजूवास, बीकानेर।

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