
छोटे निजी अस्पतालों पर पड़ी आर्थिक मार, कर्मचारी परेशान, प्रबंधन लाचार
बीकानेर. राइट टू हेल्थ बिल और जयपुर में आंदोलनरत चिकित्सकों पर बल प्रयोग के मुद्दे पर जैसे-जैसे चिकित्सकों की हड़ताल एक-एक दिन कर लंबी खिंच रही है, इसका खमियाजा मरीजों के साथ ही छोटे निजी अस्पतालों की आर्थिकी पर भी दिखने लगा है। भले ही संपूर्ण चिकित्सा समाज इस पूरे मामले में एकजुटता दर्शा रहा हो, लेकिन खासतौर से छोटे निजी चिकित्सालयों के लिए हालात का मुकाबला कर पाना अब कठिन होता जा रहा है। दिन गुजरने के साथ ही स्टाफ की सैलरी और अन्य खर्चों के रास्ते पूरी तरह बंद हो चुके हैं। लिहाजा, स्टाफ को सैलरी की चिंता सताए जा रही है। बड़े और नामी चिकित्सकों को छोड़ दें, तो छोटे-मंझोले और नई-नई प्रैक्टिस शुरू करने वाले निजी चिकित्सकों के लिए भी गंभीर चिंताएं उत्पन्न हो गई हैं।
बीकानेर की बात करें, तो यहां करीब 30 छोटे-बड़े निजी चिकित्सालय हैं। यहां सफाईकर्मी, चपरासी, वार्ड बॉय से लेकर चिकित्सा-गैर चिकित्सा कार्यों से जुड़ा एक बड़ा समूह ऐसा है, जो दिहाड़ी मजदूरों की तरह कार्य करता है। अधिकांश लोग संविदा पर होते हैं। ऐसे में उनके चूल्हे तक ठंडे पड़ने की नौबत आ चुकी है। एक अनुमान के मुताबिक, अकेले बीकानेर शहर में लगभग पांच सौ परिवारों पर इसका सीधा असर पड़ा है, जिनके सदस्य किसी न किसी छोटे निजी चिकित्सालय से जुड़े हैं।
अब तक 50 लाख से ज्यादा का नुक़सान
इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के सचिव डॉ विकास पारीक की मानें, तो जिले में 10 अस्पताल बड़े हैं और लगभग 20 छोटे अस्पताल हैं। इन सभी अस्पतालों को इस हड़ताल की अवधि के दौरान 50 से 60 लाख रुपए तक का नुक़सान हो चुका है। छोटे नर्सिंग होम संचालकों को प्रतिदिन करीब 50 हजार रुपए की चपत लग रही है।
मरीजों के लिए संकट यह...
मरीजों के लिए संकट इसलिए बड़ा होता जा रहा है कि घर पर परामर्श देने वाले चिकित्सक भी अब मना करने लगे हैं। इससे गंभीर मरीजों को ज्यादा दिक्कतें पेश आ रही हैं।
Published on:
29 Mar 2023 02:45 am
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