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बीकानेर. मरूनगरी बीकानेर की लोक संस्कृति, खान-पान, रीति रिवाज, परम्परा, रेतीले धोरों की ओर देश के विभिन्न अंचलों के ही नहीं सात समंदर पर पाश्चात्य संस्कृति में रचे बसे विदेशी सैलानी भी दिन प्रतिदिन आकर्षित हो रहे हैं। यहीं कारण रहा कि एक दशक में बीकानेर की नक्काशीदार हवेलियों, जूनागढ़, देशनोक करणी माता समेत अन्य गांव-ढाणियों में लगने वाले मेलों को देखने, यहां की परम्परा, रीति रिवाज, पहनावा, रहन-सहन से रूबरू होने के लिए साल दर साल पर्यटकों की संख्या में इजाफा हो रहा है।फोटो -नौशाद अली।

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बीकानेर. मरूनगरी बीकानेर की लोक संस्कृति, खान-पान, रीति रिवाज, परम्परा, रेतीले धोरों की ओर देश के विभिन्न अंचलों के ही नहीं सात समंदर पर पाश्चात्य संस्कृति में रचे बसे विदेशी सैलानी भी दिन प्रतिदिन आकर्षित हो रहे हैं। यहीं कारण रहा कि एक दशक में बीकानेर की नक्काशीदार हवेलियों, जूनागढ़, देशनोक करणी माता समेत अन्य गांव-ढाणियों में लगने वाले मेलों को देखने, यहां की परम्परा, रीति रिवाज, पहनावा, रहन-सहन से रूबरू होने के लिए साल दर साल पर्यटकों की संख्या में इजाफा हो रहा है। इसी के चलते देशी-विदेशी पर्यटकों की संख्या डेढ़ गुना बढ़ गई है। हालांकि देशी पर्यटकों की संख्या दोगुनी हो गई है वहीं विदेशी पर्यटकों की संख्या भी लगातार बढ़ रही है। रामपुरिया हवेली पर अपने बच्चे के साथ सेल्फी लेती महिला। फोटो -नौशाद अली।

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बीकानेर. मरूनगरी बीकानेर की लोक संस्कृति, खान-पान, रीति रिवाज, परम्परा, रेतीले धोरों की ओर देश के विभिन्न अंचलों के ही नहीं सात समंदर पर पाश्चात्य संस्कृति में रचे बसे विदेशी सैलानी भी दिन प्रतिदिन आकर्षित हो रहे हैं। यहीं कारण रहा कि एक दशक में बीकानेर की नक्काशीदार हवेलियों, जूनागढ़, देशनोक करणी माता समेत अन्य गांव-ढाणियों में लगने वाले मेलों को देखने, यहां की परम्परा, रीति रिवाज, पहनावा, रहन-सहन से रूबरू होने के लिए साल दर साल पर्यटकों की संख्या में इजाफा हो रहा है। इसी के चलते देशी-विदेशी पर्यटकों की संख्या डेढ़ गुना बढ़ गई है। हालांकि देशी पर्यटकों की संख्या दोगुनी हो गई है वहीं विदेशी पर्यटकों की संख्या भी लगातार बढ़ रही है। रामपुरिया हवेली पर अपने बच्चे के साथ सेल्फी लेती महिला। फोटो -नौशाद अली।

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बीकानेर. मरूनगरी बीकानेर की लोक संस्कृति, खान-पान, रीति रिवाज, परम्परा, रेतीले धोरों की ओर देश के विभिन्न अंचलों के ही नहीं सात समंदर पर पाश्चात्य संस्कृति में रचे बसे विदेशी सैलानी भी दिन प्रतिदिन आकर्षित हो रहे हैं। यहीं कारण रहा कि एक दशक में बीकानेर की नक्काशीदार हवेलियों, जूनागढ़, देशनोक करणी माता समेत अन्य गांव-ढाणियों में लगने वाले मेलों को देखने, यहां की परम्परा, रीति रिवाज, पहनावा, रहन-सहन से रूबरू होने के लिए साल दर साल पर्यटकों की संख्या में इजाफा हो रहा है। इसी के चलते देशी-विदेशी पर्यटकों की संख्या डेढ़ गुना बढ़ गई है। हालांकि देशी पर्यटकों की संख्या दोगुनी हो गई है वहीं विदेशी पर्यटकों की संख्या भी लगातार बढ़ रही है। रामपुरिया हवेली पर अपने बच्चे के साथ सेल्फी लेती महिला। फोटो -नौशाद अली।