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Bikaner: नख से सिर तक सोने-चांदी में सजी गणगौर पर 24 घंटे हथियारबंद पहरा, साल में सिर्फ 2 दिन दर्शन

Gangaur Festival Bikaner: शहर की परंपरा,आस्था और वैभव का अनूठा संगम है चांदमल ढढ्ढा की गणगौर प्रतिमा। सिर से नख तक बेशकीमती स्वर्णाभूषणों से सजी यह प्रतिमा 24 घंटे हथियारबंद पुलिस के कड़े पहरे में रहती है।

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चांदमल ढढ्ढा की गणगौर के साल में सिर्फ 2 दिन दर्शन, पत्रिका फोटो

चांदमल ढढ्ढा की गणगौर के साल में सिर्फ 2 दिन दर्शन, पत्रिका फोटो

Gangaur Festival Bikaner: शहर की परंपरा,आस्था और वैभव का अनूठा संगम है चांदमल ढढ्ढा की गणगौर प्रतिमा। सिर से नख तक बेशकीमती स्वर्णाभूषणों से सजी यह प्रतिमा 24 घंटे हथियारबंद पुलिस के कड़े पहरे में रहती है। रियासतकाल से चली आ रही इस परंपरा के प्रति श्रद्धालुओं, खासकर महिलाओं में गहरी आस्था है।

प्रतिमा के साथ पांव के पास बालक स्वरूप ‘भाईया’ की उपस्थिति और दिव्य शृंगार इसकी विशेषता को और बढ़ा देता है। यह गणगौर प्रतिमा वर्षभर में केवल तृतीया और चतुर्थी के दिन ही श्रद्धालुओं के दर्शनार्थ बाहर आती है। यही कारण है कि एक झलक पाने के लिए श्रद्धालु दूर-दूर से यहां पहुंचते हैं और आस्था में डूबकर दर्शन करते हैं।

साल में सिर्फ दो दिन खुलते हैं दर्शन

यह गणगौर प्रतिमा वर्षभर में केवल तृतीया और चतुर्थी के दिन ही श्रद्धालुओं के दर्शनार्थ बाहर आती है। करीब 150 वर्ष से अधिक पुरानी इस प्रतिमा को इन दो दिनों में हवेली से बाहर पाटे पर विराजित किया जाता है। इस वर्ष दो दिवसीय मेले का आज अंतिम दिन है। जिसमें हजारों श्रद्धालु ढढ्ढा चौक पहुंचकर मां गवरजा के दर्शन कर रहे हैं।

ढोल-झालर की थाप पर झूमती आस्था

मेले के दौरान वातावरण पूरी तरह भक्ति और लोक रंग में रंग जाता है। महिलाएं और बालिकाएं पारंपरिक वेशभूषा में ढोल और झालर की संगत पर घंटों नृत्य प्रतिमा के समक्ष चरण वंदना और मनोकामना करती हैं। यह दृश्य न केवल आस्था का, बल्कि बीकानेर की जीवंत लोक संस्कृति का भी अद्भुत उदाहरण बन जाता है।

संतान प्राप्ति की मान्यता से जुड़ी आस्था

इस गणगौर प्रतिमा के प्रति महिलाओं में विशेष विश्वास है। मान्यता है कि मां गवरजा के दर्शन और पूजा से संतान प्राप्ति का आशीर्वाद मिलता है। इसी आस्था के चलते हर वर्ष बड़ी संख्या में महिलाएं यहां पहुंचती हैं और श्रद्धा से पूजा-अर्चना करती हैं।

दिन में दर्शन, रात में मेला

दो दिवसीय आयोजन के दौरान सुबह से शाम तक हवेली में दर्शन होते हैं। शाम से रात तक चौक में मेला लगता है। ढढ्ढा चौक इन दो दिनों में पूरी तरह आस्था, परंपरा और उत्सव के रंग में डूबा नजर आता है। वर्ष में सिर्फ दो दिन ही ढढ्ढा चौक में श्रद्धालुओं की भारी संख्या का सैलाब उमड़ता है।