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बीकाणा की दुनिया को देन, केसरिया बालम आवो नीं पधारो म्हारे देश…

Bikaner news: स्मृति शेष- अल्लाह जिलाई बाई की पुण्यतिथि पर विशेष: राज दरबार से शुरुआत कर मांड गायन को दिलाई अंतरराष्ट्रीय पहचान

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बीकाणा की दुनिया को देन, केसरिया बालम आवो नीं पधारो म्हारे देश...

बीकाणा की दुनिया को देन, केसरिया बालम आवो नीं पधारो म्हारे देश...

बीकानेर. सत्तर का दशक था। आकाशवाणी पर पहली बार अल्लाह जिलाई बाई ने केसरिया बालम आवो नीं पधारो म्हारे देश... गाया, जो श्रोताओं के मनो-मस्तिष्क पर छा गया। इसी के साथ मांड गायन ने देशभर और बाद में अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी पहचान कायम की। इससे पहले यह गायिका बीकानेर रियासत की राज गायिका के रूप में ख्याति अर्जित कर चुकी थीं। बात कर रहे हैं मांड गायिका अल्लाह जिलाई बाई की, जिनका जन्म बीकानेर में हुआ। 3 नवम्बर को उनकी पुण्यतिथि पर कई तरह के आयोजन हो रहे हैं। राजस्थान की इस स्वर कोकिला ने मात्र 13 साल की उम्र में राज दरबार में गाना शुरू कर दिया था। उन्होंने 22 साल तक तत्कालीन राज दरबार में गायन किया। तत्कालीन महाराजा गंगासिंह उनके मांड गायन से इतने अभिभूत थे कि उन्हें बुलाकर उनकी स्वर लहरियों को तल्लीनता से सुनते थे। उनके गाए केसरिया बालम गीत के साथ बाई सा रा बीरा..., काली काली काजलिए री रेख... और झालों दियो जाय... जैसे गीत कालजई बन गए।

बीकानेर में जन्म और संगीत की शिक्षा

अल्लाह जिलाई बाई का जन्म 1 फरवरी 1902 को जयसिंहदेसर मगरा में हुआ। बाद में परिवार तेलीवाड़ा बीकानेर में आकर रहने लगा। इनके पिता का नाम नबी बक्श तथा माता अलीमन थीं। 90 साल की उम्र में 3 नवंबर 1992 को अल्लाह जिलाई बाई का निधन हो गया। उन्होंने छोटी उम्र में संगीत की शिक्षा उस्ताद हुसैन बक्श खान से ली। बाद में अचन महाराज के सानिध्य में गायन को तराशा। वे मांड, ठुमरी, ख़याल और दादरा में पारंगत थीं, परन्तु पहचान मांड गायन से ही पाई। अल्लाह जिलाई बाई ने गुणिजनखाना तेलीवाड़ा में 1915 से 1947 तक अध्यापन का कार्य भी किया। उनके एक पुत्री सबीरा बेगम हुईं, जिनके पुत्र डाॅ. अजीज अहमद सुलेमानी जाने-माने चिकित्सक हैं। मांड गायन को जिलाई बाई के बाद उनके दोहिते डाॅ. सुलेमानी गत तीन दशक से आगे बढ़ाने में जुटे हैं। हर वर्ष 3 नवम्बर को जिलाई बाई की पुण्य तिथि पर मांड गायकी प्रशिक्षण संस्थान के माध्यम से इस लोक गायन शैली पर कार्यक्रम आयोजित करवाते हैं।

पद्मश्री सम्मान और स्मृति में डाक टिकट

जिलाई बाई को 1982 में भारत सरकार ने पद्म श्री से नवाजा। उन्हें राजस्थान श्री और राजस्थान रत्न जैसे सम्मान भी मिले। भारतीय डाक विभाग ने स्मृति में डाक टिकट भी जारी किया। उनका केसरिया बालम आवो नीं पधारो म्हारे देश गीत, राष्ट्रीय स्तर पर आकाशवाणी पर सबसे पंसदीदा गीत रहा है। यहां तक कि देश-विदेश से आने वाले मेहमानों के स्वागत में ये गीत गाया जाने लगा। विशेषकर राजस्थान में तो मेहमान यह मांड गायन सुनना स्वागत-सत्कार का सुखद अनुभव मानते हैं।अल्लाह जिलाई बाई की आवाज में ऐसा जादू था कि उनके गाए लोकगीत सुनकर श्रोता आज भी मंत्र मुग्ध हो जाते हैं। मांड गायन प्रतियोगिता में उनके गीतों को प्रमुखता मिलती है।

पान की शौकीन, मर्दाना मिजाज

अल्लाह जिलाई बाई जीवंत और मर्दाना मिजाज की महिला थीं। पान की शौकीन थीं। खाने में आलू के व्यंजन तथा फलों में अन्नानास कटलेट बहुत पसंद था। चमेली के फूलों का गजरा और सफेद वस्त्र खास पसंदीदा थे। मरदाना अंदाज में उनकी गालियां भी ऐसी होती थीं, जो सुनने वाले के कानों में जैसे संगीत घोलती थीं।

...लंदन में रो पड़े थे श्रोता

उनके दोहिते डाॅ. अजीज अहमद बताते हैं कि 1987 में लदंन में अंतरराष्ट्रीय लोक संगीत कार्यक्रम हुआ था। करीब 20 देशों के लोक कलाकारों ने भाग लिया। कोमल कोठारी ने अल्लाह जिलाई बाई को आमंत्रित किया। वहां के स्टेडियम में हजारों श्रोताओं की उपस्थिति में जिलाई बाई ने बिना माइक के केसरिया बालम और बाई सा रा बीरा जैसे लोकगीत करीब एक घंटे तक गाया। गायन समाप्त होने पर कई पत्रकार और लोग उनसे मिलने को ऐसे बेताब हुए कि रो पड़े। उनके ये गीत उनकी ही भाषा में थे, लेकिन गायन शैली ने उनके आंसू ला दिए।