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यहां स्माधि स्थल की सीमा में प्रवेश करते ही श्रद्धालु अपने आप ही नशे से हो जाते दूर

मुकाम देश का ऐसा तीर्थस्थल है, जहां नशा पूरी तरह प्रतिबंधितपर्यावरण शुद्धि : 50 मण घी और खोपरे की 10 किमी तक महक, पांच लाख ने लगाई जांभोजी को धोक, 1200 सेवकदल कार्यकर्ताओं ने संभाली मेले की व्यवस्था

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यहां स्माधि स्थल की सीमा में प्रवेश करते ही श्रद्धालु अपने आप ही नशे से हो जाते दूर

यहां स्माधि स्थल की सीमा में प्रवेश करते ही श्रद्धालु अपने आप ही नशे से हो जाते दूर

नोखा . बीकानेर. मुक्तिधाम मुकाम में बिश्नोई समाज के गुरु जंभेश्वर महाराज के समाधि स्थल पर रविवार को फाल्गुनी मेला सम्पन्न हुआ। दो दिन के दौरान देश-विदेश से आए पांच लाख से अधिक श्रद्धालुओं ने जांभोजी को धोक लगाई। यहां पर्यावरण शुद्धि के लिए मंदिर परिसर और समराथल धोरा पर चार बड़े हवन-कुंड बने हुए है। इनमें करीब 50 मण देशी घी और पचास मण खोपरे की आहुति दी गई। हवन कुंड से निकली घी-खोपरे की खुशबू से 10 किलोमीटर की परिधि का क्षेत्र महक उठा।

मुकाम देश का ऐसा तीर्थस्थल है, जहां नशा पूरी तरह प्रतिबंधित है। यहां नशा करना तो दूर मेला परिसर में बीड़ी, सिगरेट, तंबाकू, गुटका तक का कोई सेवन नहीं करता। मुकाम पीठाधीश्वर स्वामी रामानंद महाराज व अखिल भारतीय बिश्नाई महासभा के राष्ट्रीय प्रधान देवेंद्र बूडि़या के मुताबिक मुकाम स्माधि स्थल की सीमा में प्रवेश करते ही श्रद्धालु अपने आप ही नशे से दूर हो जाते हैं। जब तक मेले में रहते हैं, नशे की किसी चीज को हाथ तक नहीं लगाते। ऐसा 485 साल से चला आ रहा है। खुद ही नशा छोड़ने के यहां के नियम अपने आप में एक मिशाल है। मेले की व्यवस्था में 1200 सेवक दल के कार्यकर्ता लगते हैं।

500 साल से भर रहा है मेला
मुकाम में आसोज व फाल्गुनी अमावस्या पर मेला भरता है। यह मेले करीब 500 साल से भी अधिक समय से लग रहे है। गुरु जंभेश्वर महाराज ने यहां समाधि ली थी। ऐसे में मुक्तिधाम मुकाम भी बोलते है। करीब 20-22 साल पहले मंदिर का जीर्णोद्धार किया गया। इसके बाद से दोनों मेलों में देशभर से लाखों की तादाद में श्रद्धालु आ रहे है। करीब 539 साल पहले गुरु जंभेश्वर महाराज ने बिश्नोई समाज की स्थापना की थी।

विदेश से भी आते हैं श्रद्धालु
मुकाम में गुरु महाराज के स्माधिस्थल पर धोक लगाने देश के विभिन्न राज्यों में बसे बिश्नोई समाज के लोग तो श्रद्धानवत आते ही है, विदेशों से भी आसोज व फाल्गुनी मेले में बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते है। खासकर राजस्थान, हरियाणा, पंजाब, दिल्ली, कनार्टक, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र से सबसे ज्यादा महिलाएं और पुरुष पहुंचते है। कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, सऊदी अरब में बसे भारतीय भी खूब आते है। इसका अनुमान मेले में चढ़ावा में आने वाली विदेशी कंरेसी से लगता है।

जहां तक हवन की खुशबू, वहां तक पर्यावरण शुद्ध

मंदिर परिसर और समराथल धोरा दोनों जगह 8 गुणा 6 फीट के हवन कुंड बने हुए है। जो जमीन से करीब पांच फीट की ऊंचाई पर बनाए गए है। मेले में प्रत्येक श्रद्धालु 50 ग्राम देशी घी और खोपरों की आहुति हवन में देता है। हवन सूर्य उदय के साथ शुरू हो जाता है और सूर्यास्त तक अनवरत चलता है। इस हवन की 10 किमी दूर तक का महक आती है। ऐसी मान्यता है कि जहां तक खुशबू पहुंचेगी, वहां तक पर्यावरण शुद्ध हो जाएगा।