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राजस्थान के इस जिले में पाकिस्तान के मुल्तान की मिट्टी से बने मुखौटे पहन कर होती है नृसिंह-हिरण्यकश्यप लीला

राजस्थान के इस जिले में पाकिस्तान के मुल्तान की मिट्टी से बने मुखौटे पहन कर होती है नृसिंह-हिरण्यकश्यप लीला

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राजस्थान के इस जिले में पाकिस्तान के मुल्तान की मिट्टी से बने मुखौटे पहन कर होती है नृसिंह-हिरण्यकश्यप लीला

राजस्थान के इस जिले में पाकिस्तान के मुल्तान की मिट्टी से बने मुखौटे पहन कर होती है नृसिंह-हिरण्यकश्यप लीला

-विमल छंगाणी

बीकानेर. शहर में नृसिंह चतुर्दशी के दिन भगवान नृसिंह और हिरण्यकश्यप की लीला के मंचन की दशकों पुरानी परम्परा है। नृसिंह जयंती के दिन मंदिरों में भगवान नृसिंह के अभिषेक, पूजन, श्रृंगार और आरती के साथ शाम को मंदिरों के आगे नृसिंह-हिरण्यकश्यप लीलाओं के मंचन होते हैं। इनको देखने के लिए बड़ी संख्या में शहरवासी जुटते हैं। नृसिंह चतुर्दशी के दिन लखोटिया चौक स्थित मंदिर के आगे होने वाली लीला प्राचीन है। बताया जा रहा है कि लीला मंचन के दौरान भगवान नृसिंह और हिरण्यकश्यप स्वरूप की ओर से जो मुखौटे पहने जाते हैं, वे मुल्तान की मिट्टी से बने हैं। दशकों से कलाकार इन्ही मुखौटों को पहनकर लीला का मंचन करते हैं। इस बार 14 मई को नृसिंह जयंती पर नृसिंह-हिरण्यकश्यप लीलाओं का मंचन होगा।


इन स्थानों पर होता है लीलाओं का मंचन
नृसिंह चतुर्दशी के दिन शहर में डागा चौक, लखोटिया चौक, नत्थूसर गेट, लालाणी व्यास चौक, दुजारियों की गली में स्थित नृङ्क्षसह मंदिरों के आगे नृसिंह-हिरण्यकश्यप लीलाओं के मंचन होते हैं। डागा चौक स्थित नृसिंह मंदिर प्राचीन और रियासतकालीन है। नृसिंह चतुर्दशी के दिन मंदिरों में धार्मिक अनुष्ठान होते हैं। बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन-पूजन करते हैं। शाम को मंदिरों के आगे लीलाएं होती हैं। भगवान नृसिंह, भक्त प्रहलाद की पुकार सुनकर थंब से प्रकट होते हैं और हिरण्यकश्यप का प्रतीकात्मक वध करते हैं।

मिट्टी-कुट्टी से बने हैं मुखौटे
श्री नृसिंहजी मंदिर ट्रस्ट लखोटिया चौक के ट्रस्टी मनोज लखोटिया के अनुसार भगवान नृसिंह और हिरण्यकश्यप स्वरूप के मुखौटे रियासतकालीन हैं। ये मुखौटे मुल्तान में बने हुए हैं। मुल्तान अब पाकिस्तान में है। मिट्टी, कागज की लुगदी से ये मुखौटे बनाए जाते हैं। मुखौटों पर सुनहरे रंग से चित्रकारी होती है। इन पर सोने की कलम का काम आकर्षित करता है। भगवान नृसिंह और हिरण्यकश्यप का स्वरूप धारण करने वाले कलाकार इन्ही मुखौटों को पहनकर लीला का मंचन करते हैं। चन्द्रशेखर श्रीमाली के अनुसार लखोटिया परिवार मुल्तान से बीकानेर आए। बीकानेर में भगवान नृसिंह की सेवा भी साथ लेकर लाए। मुखौटे मुल्तान से बनवाए गए। लखोटिया चौक में ट्रस्ट, मोहल्लेवासियों और नृसिंह भक्तों की ओर से हर साल मेले का आयोजन किया जाता है। लखोटिया चौक के अलावा बाकी जगहों पर लीलाओं में सामान्यत: धातुओं के बने होते हैं।


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