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जहां देश का इकलौता ऊंट अनुसंधान केंद्र, वहीं डूब रहा ‘जहाज’

देश में ऊंटों की आबादी में सर्वाधिक गिरावट बीकानेर में  

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जहां देश का इकलौता ऊंट अनुसंधान केंद्र, वहीं डूब रहा 'जहाज'

जहां देश का इकलौता ऊंट अनुसंधान केंद्र, वहीं डूब रहा 'जहाज'

आशीष जोशी

देश में ऊंटों की आबादी में सर्वाधिक गिरावट बीकानेर जिले में आई है। यहां करीब चार दशक पहले राष्ट्रीय उष्ट्र अनुसंधान केंद्र की स्थापना की गई थी। जहां ऊंटनी के दूध समेत ऊंटों पर कई तरह के अनुसंधान हो रहे हैं, लेकिन संवद्र्धन की बजाय सात सालों में जिले में करीब 19 हजार ऊंट कम हो गए। इस दरम्यान प्रदेश में ऊंटों की तादाद में एक लाख 13 हजार की गिरावट आई है। बीकानेर के बाद बाड़मेर, जैसलमेर और चूरू में इनकी संख्या ज्यादा गिरी है। प्रदेश में केवल बूंदी, चित्तोडग़ढ़, डूंगरपुर, झालावाड़, प्रतापगढ़ और कोटा ही ऐसे जिले हैं जहां ऊंटों की आबादी बढ़ी है। पिछले एक दशक में ऊंटों की संख्या में करीब 35 फीसदी से ज्यादा की कमी आई है, जो 3.26 लाख से घटकर 2 लाख से भी कम हो गई है। राज्य में वर्ष 2012 में ऊंटों की गणना हुई तो इनकी संख्या 3,25,713 थी, वहीं 2019 की गणना में ये घटकर 2,12,739 रह गई। पिछले दो सालों में यानी 2020 व 2021 तक करीब 28 हजार ऊंट और कम हो गए। अब इनकी तादाद दो लाख से भी कम रह गई हंै। हैरान करने वाला आंकड़ा यह है कि तीन दशक में प्रदेश में ऊंटों की संख्या में लगभग 85 प्रतिशत की कमी आई है।


क्यों घट रहे ऊंट
- परिवहन व खेती में उपयोग नहीं।

- जैसलमेर के अलावा कहीं भी ऊंट का उपयोग पर्यटन में भी बड़े स्तर पर नहीं हो रहा। जबकि सैलानी कैमल सफारी पसन्द करते हैं।
- पर्यटन के लिए बने सर्किट में बीकानेर के ऊष्ट्र अनुसंधान केंद्र का नाम तक नहीं।

- ऊंट पालक को किसी तरह की विशेष सरकारी सहायता नहीं। बड़ी योजनाओं का अभाव।
- क्षेत्र में सौर ऊर्जा प्लांट आ गए और चारागाह खत्म हो गए।


इन 5 जिलों में सर्वाधिक गिरावट

जिला - वर्ष 2012 - 2019 - गिरावट
बीकानेर - 46209 - 27357 - 18852

बाड़मेर - 43172 - 25907 - 17265
जैसलमेर - 49917 - 34492 - 15425

चूरू - 33959 - 19652 - 14307
हनुमानगढ़ - 31226 - 17375 - 13851

(19वीं और 20वीं पशुधन संगणना के अनुसार)

प्रदेश में 1992 के बाद लगातार कम हो रहे ऊंट
वर्ष -ऊंटों की संख्या

1951 - 3.41
1956 -4.36

1961 -5.70
1966 -6.54

1972 -7.45
1977 -7.52

1983 -7.56
1988 -7.19

1992 - 7.46
1997 -6.69

2003 -4.98
2007 -4.22

2012 -3.25
2019 -2.12

(पशु गणना के आंकड़े लाख में)


कभी जीवन शैली का हिस्सा, अब बन रहा किस्सा
ऊंट हमारी लोक संस्कृति का हिस्सा रहा है। रेगिस्तान का जहाज ओरणों का सरताज था। दो-तीन दशक पहले तक यहां के लोगों के लिए ऊंटों का बड़ा महत्व था। ऊंट वाला घर समृद्ध माना जाता था। अब सब कुछ बदल गया। रेगिस्तान की तपती रेत पर 65 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से दौडऩे वाले ऊंट लगातार कम हो रहे हैं।


जानिए अपने ऊंट को

- सवारी की दृष्टि से ऊंट की गोमठ नस्ल सबसे अच्छी मानी जाती है।
- बोझा ढोने के लिए ऊंट की बीकानेरी नस्ल बेहतर।

- विश्व युद्ध से लेकर चीन के संघर्षों में शामिल रहा है बीकानेर का गंगा रिसाला ऊंट दस्ता।
- बीएसएफ के जवान ऊंटों पर सवार होकर सीमा की निगहबानी करते हैं।


1984 में हुई थी राष्ट्रीय उष्ट्र अनुसंधान केंद्र की स्थापना

केंद्र सरकार ने ऊंटों पर अनुसंधान और विकास को बढ़ावा देने के लिए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के तहत 1984 में राष्ट्रीय उष्ट्र अनुसंधान केंद्र की स्थापना की। केंद्र लम्बे समय से ऊंटनी के दूध और इसकी उपयोगिता पर काम कर रहा है। शोध के अनुसार ऊंटनी का दूध कई बीमारियों के उपचार में लाभकारी है। केंद्र ऊंट पालकों को ऊंट के दूध से कई तरह के उत्पाद बनाने का प्रशिक्षण भी देता है।

एक्सपर्ट व्यू : प्रोत्साहन की दरकार
वर्ष 2015 में राजस्थान सरकार ऊंट: वध का प्रतिषेध और अस्थायी प्रवजन या निर्यात का विनियमन अधिनियम लेकर आई। जिसका उद्देश्य ऊंटों के वध और राज्य से बाहर उनकी खरीद फरोख्त पर रोक लगा कर संरक्षण करना था। लेकिन इसका उल्टा असर हो गया। इसमें कुछ बदलाव कर ऊंटों की खरीद-बेचान में रियायत देनी चाहिए। तत्कालीन राज्य सरकार ने दो अक्टूबर 2016 को उष्ट्र विकास योजना शुरू की थी। ऊंट पालन को बढ़ावा देने के लिए ऊंटनी के प्रजनन पर तीन किस्तों में 10 हजार रुपए दिए जाते थे। राशि बढ़ाकर यह योजना फिर शुरू करनी चाहिए। सरकार को ऊंटनी के दूध के कलेक्शन, प्रोसेसिंग और मार्केटिंग सेंटर विकसित करने चाहिए। उपयोगिता और इससे कमाई बढ़ेगी तो पशुपालक इसे पालने में भी रूचि लेंगे।

- डॉ. आर्तबंधु साहू, निदेशक, राष्ट्रीय उष्ट्र अनुसंधान केंद्र