करीब ढाई दशक से बंद पड़े आज की दुनिया की निगाहों से दूर इस हॉल की ओर बीते कल सोमवार को तब ही शहर की निगाह उठी, जब इसने आग की लपटों से घिर कर लोगों को ध्यान आकृष्ट किया।
बीकानेर. जिस सिनेमा हॉल की एक सीट के लिए सिनेप्रेमी टिकट की चाह में मारामारी (जद्दोजहद) करते थे, उसी सिनेमा हॉल की कुर्सियां अब राख में तब्दील हो चुकी हैं। कुर्सियों में लगा रेग्जीन, जूट की घास, लकड़ी के पटड़े अब राख बन चुके हैं। बचा है तो कुर्सियों का केवल लोहे वाला हिस्सा व कुर्सियों की स्प्रिंगें। फुलस्क्रीन सफेद पर्दे की खाली जगह राख की कालिख से रंगी-पुती मानों अनदेखी की कहानी बयां कर रही है। दाऊजी रोड स्थित प्रकाश चित्र सिनेमा हॉल का आज यही हाल है। करीब ढाई दशक से बंद पड़े आज की दुनिया की निगाहों से दूर इस हॉल की ओर बीते कल सोमवार को तब ही शहर की निगाह उठी, जब इसने आग की लपटों से घिर कर लोगों को ध्यान आकृष्ट किया। देखते ही देखते उठी भीषण आग की लपटों ने हॉल में लगी दर्जनों कुर्सियों, लकड़ी की छत, बीम आदि को अपने आगोश में ले लिया व राख में तब्दील कर दिया।
कभी रहा गुलजार, अब िस्थति भयावह
प्रकाश चित्र सिनेमा करीब तीन दशक से अधिक समय पहले शहर के प्रमुख सिनेमा हॉल में एक था। फिल्मों के शो के दौरान हॉल दर्शकों के उत्साह, गीत, संगीत पर बजाई जाने वाली सीटियों से गुलजार रहता था। रोशनी से चमकता रहता था। दर्शक हॉल के भव्य नजारे को निहारते रहते थे। सोमवार को लगी आग ने हॉल की सूरत ही बिगाड़ दी है। अंदर का नजारा भयावह है। हर तरफ राख ही राख। बिखरी लोहे की स्प्रिंगें, लोहे के पटड़े नजर आते हैं। दीवारें पुरानी व आग की लपटों से काली हो चुकी हैं। हॉल के तीन तरफ कई गेट, शटर व बारियां हैं, जो खुले पड़े हैं। रोकने-टोकने वाला कोई नहीं है।
सुलगती रही आग
सोमवार शाम को लगी आग को हालांकि मध्यरात्रि बाद तक पूरी तरह से बुझा दिया गया, लेकिन हॉल के अंदर अंधेरा होने व पुरानी इमारत होने के कारण खतरा बने होने के चलते आग पूरी तरह से बुझ नहीं पाई। क्षेत्र निवासी नटवर जोशी ने बताया कि सुबह हॉल के पर्दे की ओर धुंआ उठता रहा। आग सुलगती नजर आई। दमकल की गाड़ी आई व पानी डाला। इसके बाद भी हॉल के अंदर एक कोने में दोपहर तक रुक-रुक कर धुंआ उठता रहा। पार्षद रमजान कच्छावा का कहना है कि निगम प्रशासन हॉल के इस पूरे परिसर को अपने कब्जे में ले व इसकी सुध ले।