
......कभी पेड़ों की डालियों पर गूंजती थीं कजरियां, अब बाजारों में लहरिया-बंधेज की रौनक तो है, लेकिन झूले विरले ही दिखते हैं; .
.......अभी भी कुछ संस्थाएं जुटी है परंपरा बचाने में, अनूपगढ़ पंजाबी विरसा क्लब की तरफ से कार्यक्रम का आयोजन
फोटो अनूपगढ़ कार्यक्रम में नृत्य करती बालिकाएं।
अनूपगढ़ .सावन का महीना शुरू होते ही प्रकृति हरियाली की चादर ओढ़ लेती है। तीज और सावन के गीतों के साथ महिलाओं के उल्लास का यह महीना कभी गांवों और कस्बों की सबसे बड़ी सांस्कृतिक पहचान हुआ करता था। जैसे ही पहली बारिश होती, पेड़ों की मजबूत डालियों पर झूले पड़ जाते थे। झूलों पर पींगें भरती युवतियां, हाथों में मेहंदी, हरी चूड़ियां, लहरिया की साड़ियां और कजरी-तीज के लोकगीतों से पूरा माहौल जीवंत हो उठता था। लेकिन समय के साथ यह तस्वीर तेजी से बदल गई है। आज सावन तो हर साल आता है, लेकिन उसकी सबसे खूबसूरत पहचान—पेड़ों पर पड़ने वाले झूले—लगभग गायब हो चुके हैं।
क्षेत्र में अब ऐसे दृश्य बहुत कम देखने को मिलते हैं। जिन बाग-बगीचों और चौपालों में कभी झूलों की कतारें लगती थीं, वहां अब या तो पक्के निर्माण हो चुके हैं या फिर बड़े पेड़ ही नहीं बचे। नई पीढ़ी के लिए सावन का मतलब अब सोशल मीडिया पर तीज की तस्वीरें और रील्स बनकर रह गया है, जबकि असली लोक संस्कृति धीरे-धीरे स्मृतियों में बदल रही है।
.........मायके जाने की परंपरा भी पड़ गई फीकी
बुजुर्ग बताते हैं कि पहले सावन शुरू होते ही विवाहित बेटियों को मायके बुलाने की परंपरा थी। बहू-बेटियां पूरे महीने सखी-सहेलियों के साथ झूले झूलती थीं। दोपहर से लेकर शाम तक गांव के बगीचों में महिलाओं का जमावड़ा लगता था। कजरी, मल्हार और तीज के लोकगीतों की स्वर लहरियां दूर-दूर तक सुनाई देती थीं। कई गांवों में झूलनोत्सव आयोजित किए जाते थे, जिनमें पूरा गांव शामिल होता था। आज रोजगार, पढ़ाई और व्यस्त जीवनशैली के कारण यह परंपरा भी तेजी से कमजोर हो रही है।
...........पेड़ कम हुए तो खत्म हो गई झूलों की जगह
सावन के झूले गायब होने के पीछे सबसे बड़ा कारण पर्यावरण और जीवनशैली में आया बदलाव माना जा रहा है। पहले गांवों में बड़े-बड़े नीम, पीपल, बरगद और शीशम के पेड़ होते थे, जिनकी मजबूत डालियों पर झूले डाले जाते थे। अब पेड़ों की कटाई, शहरीकरण और बाग-बगीचों के खत्म होने से झूले डालने की जगह ही नहीं बची। बहुमंजिला इमारतों और छोटे मकानों ने बड़े आंगनों की जगह ले ली है।
.........मोबाइल ने छीना मेल-मिलाप का समय
कलाकार भूपेंद्र संधू ने कहा कि समय के साथ यह परंपरा पीछे छूट रही है। डिजिटल युग ने भी इस परंपरा को गहरा असर पहुंचाया है। पहले शाम होते ही महिलाएं और युवतियां एक स्थान पर एकत्र होकर झूला झूलती थीं, लेकिन अब मोबाइल फोन, सोशल मीडिया और डिजिटल मनोरंजन ने सामूहिक आयोजनों की जगह ले ली है। पहले जहां लोकगीत गूंजते थे, वहां अब मोबाइल की घंटियां सुनाई देती हैं।
..........बाजारों में अब भी दिखता है सावन का रंग
हालांकि झूलों की परंपरा कमजोर पड़ी है, लेकिन सावन का उत्साह बाजारों में कुछ कुछ आज भी साफ दिखाई देता है। कपड़ा व्यापारी ललित चराया ने बताया कि तीज और सावन को लेकर लहरिया, बंधेज की मांग शुरू हो जाती है। लेकिन उसके ग्राहक भी सीमित संख्या में होते हैं। महिलाओं में पारंपरिक वेशभूषा पहनने का उत्साह आज भी कहीं कही देखने को मिल जाता है।
...…......कुछ संस्थाएं बचा रही हैं लोक संस्कृति
परंपरा पूरी तरह खत्म न हो, इसके लिए क्षेत्र की कुछ सामाजिक तथा महिला संस्थाएं प्रयास कर रही हैं। इसी क्रम में रविवार को पंजाबी विरसा क्लब की तरफ से कार्यक्रम का आयोजन किया। कार्यक्रम स्थल पर झूले लगाए गए, गीत संगीत हुए, महिलाएं पारंपरिक वेशभूषा में तैयार हुई। महिलाओं की हंसी ठिठोली हुई ।पंजाबी विरसा क्लब की तरफ से आयोजित कार्यक्रम में नई पीढ़ी को सावन की संस्कृति से जोड़ने की कोशिश की जा रही है। परमिंदर कौर तूर, हरप्रीत कौर,कुलदीप कौर,मंजीत कौर संधू,सर्वजीत कौर,अर्चना यादव,मंजीत कौर संधू,गगनदीप कौर,राजबाला प्रविंदर कौर तथा माया प्रजापत आदि में कार्यक्रम को सफल बनाने में सहयोग दिया।
Updated on:
21 Jul 2026 06:00 am
Published on:
21 Jul 2026 06:00 am
