
बीकानेर. 'सिर साटे रूख रहे तो भी सस्ता जान।' अर्थात सिर की कीमत के बदले पेड़ बचता है तो भी कम है। इस पंक्ति को रेल थिएटर फेस्टिवल के दूसरे दिन मंचित हुए नाटक 'खेजड़ी की बेटी' में कलाकारों ने साकार किया।

बीकानेर. 'सिर साटे रूख रहे तो भी सस्ता जान।' अर्थात सिर की कीमत के बदले पेड़ बचता है तो भी कम है। इस पंक्ति को रेल थिएटर फेस्टिवल के दूसरे दिन मंचित हुए नाटक 'खेजड़ी की बेटी' में कलाकारों ने साकार किया।

बीकानेर. 'सिर साटे रूख रहे तो भी सस्ता जान।' अर्थात सिर की कीमत के बदले पेड़ बचता है तो भी कम है। इस पंक्ति को रेल थिएटर फेस्टिवल के दूसरे दिन मंचित हुए नाटक 'खेजड़ी की बेटी' में कलाकारों ने साकार किया।

बीकानेर. 'सिर साटे रूख रहे तो भी सस्ता जान।' अर्थात सिर की कीमत के बदले पेड़ बचता है तो भी कम है। इस पंक्ति को रेल थिएटर फेस्टिवल के दूसरे दिन मंचित हुए नाटक 'खेजड़ी की बेटी' में कलाकारों ने साकार किया।

बीकानेर. 'सिर साटे रूख रहे तो भी सस्ता जान।' अर्थात सिर की कीमत के बदले पेड़ बचता है तो भी कम है। इस पंक्ति को रेल थिएटर फेस्टिवल के दूसरे दिन मंचित हुए नाटक 'खेजड़ी की बेटी' में कलाकारों ने साकार किया।