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नाटक ‘खेजड़ी की बेटी’ ने दिया पर्यावरण संरक्षण का संदेश, देखे तस्वीरें…

बीकानेर. 'सिर साटे रूख रहे तो भी सस्ता जान।' अर्थात सिर की कीमत के बदले पेड़ बचता है तो भी कम है। इस पंक्ति को रेल थिएटर फेस्टिवल के दूसरे दिन मंचित हुए नाटक 'खेजड़ी की बेटी' में कलाकारों ने साकार किया।

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Rail Theater Festival

बीकानेर. 'सिर साटे रूख रहे तो भी सस्ता जान।' अर्थात सिर की कीमत के बदले पेड़ बचता है तो भी कम है। इस पंक्ति को रेल थिएटर फेस्टिवल के दूसरे दिन मंचित हुए नाटक 'खेजड़ी की बेटी' में कलाकारों ने साकार किया।

Rail Theater Festival

बीकानेर. 'सिर साटे रूख रहे तो भी सस्ता जान।' अर्थात सिर की कीमत के बदले पेड़ बचता है तो भी कम है। इस पंक्ति को रेल थिएटर फेस्टिवल के दूसरे दिन मंचित हुए नाटक 'खेजड़ी की बेटी' में कलाकारों ने साकार किया।

Rail Theater Festival

बीकानेर. 'सिर साटे रूख रहे तो भी सस्ता जान।' अर्थात सिर की कीमत के बदले पेड़ बचता है तो भी कम है। इस पंक्ति को रेल थिएटर फेस्टिवल के दूसरे दिन मंचित हुए नाटक 'खेजड़ी की बेटी' में कलाकारों ने साकार किया।

Rail Theater Festival

बीकानेर. 'सिर साटे रूख रहे तो भी सस्ता जान।' अर्थात सिर की कीमत के बदले पेड़ बचता है तो भी कम है। इस पंक्ति को रेल थिएटर फेस्टिवल के दूसरे दिन मंचित हुए नाटक 'खेजड़ी की बेटी' में कलाकारों ने साकार किया।

Rail Theater Festival

बीकानेर. 'सिर साटे रूख रहे तो भी सस्ता जान।' अर्थात सिर की कीमत के बदले पेड़ बचता है तो भी कम है। इस पंक्ति को रेल थिएटर फेस्टिवल के दूसरे दिन मंचित हुए नाटक 'खेजड़ी की बेटी' में कलाकारों ने साकार किया।