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कहीं पिता-पुत्र तो कहीं पति-पत्नी, दादा से पौत्र तक को मिले हैं टिकट

सामान्यत: यह सामने आता रहा है कि राजनीतिक पार्टियां चुनावों में जीत के लिए स्थापित नेताओं के परिवारों पर ही अधिक विश्वास व्यक्त करती हैं। जिले के कई ऐसे विधानसभा क्षेत्र रहे हैं, जहां पहले पिता फिर पुत्र, पति और पत्नी, दादा, पौत्र और पुत्रवधू को पार्टियों का टिकट मिला है

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कहीं पिता-पुत्र तो कहीं पति-पत्नी, दादा से पौत्र तक को मिले हैं टिकट

कहीं पिता-पुत्र तो कहीं पति-पत्नी, दादा से पौत्र तक को मिले हैं टिकट

राजनीति में भले ही पार्टियां कार्यकर्ताओं को सर्वोपरि मानने की बातें कहती हों, लेकिन जब चुनावों में टिकट वितरण की बात आती है, तो पार्टियों के पैमाने ही जैसे बदल जाते हैं। सामान्यत: यह सामने आता रहा है कि राजनीतिक पार्टियां चुनावों में जीत के लिए स्थापित नेताओं के परिवारों पर ही अधिक विश्वास व्यक्त करती हैं। जिले के कई ऐसे विधानसभा क्षेत्र रहे हैं, जहां पहले पिता फिर पुत्र, पति और पत्नी, दादा, पौत्र और पुत्रवधू को पार्टियों का टिकट मिला है। यह भी सत्य है कि जीत का रिकॉर्ड भी अधिकतर इन्हीं के पक्ष में है।

लूणकरनसर: पिता छह बार, पुत्र दो बार बने हैं विधायक

लूणकरनसर विधानसभा क्षेत्र में भीमसेन चौधरी कई बार विधायक चुने गए। इनके बाद इनके पुत्र वीरेन्द्र बेनीवाल भी इसी क्षेत्र से विधायक चुनकर विधानसभा पहुंचे। कांग्रेस पार्टी ने इस परिवार पर कई बार विश्वास जताया। भीमसेन चौधरी कांग्रेस के टिकट से छह बार विधायक रहे। वहीं वीरेन्द्र बेनीवाल भी कांग्रेस के टिकट से दो बार विधायक रह चुके हैं। इस बार पार्टी का टिकट नहीं मिलने पर निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में नामांकन पत्र भरा है।

कोलायत: दादा सात बार बने विधायक, अब पौत्र चुनाव मैदान में

कोलायत विधानसभा क्षेत्र में देवी सिंह भाटी का वर्ष 1980 से प्रभाव रहा है। वे 1980 से 2008 तक लगातार विधायक रहे। कई बार दल बदले, मगर जनता का विश्वास देवी सिंह भाटी पर बना रहा। वर्ष 2018 में देवी सिंह भाटी की पुत्रवधू पूनम कंवर इसी क्षेत्र से चुनाव मैदान में उतरीं, लेकिन जीत हासिल नहीं कर पाईं।भाजपा ने इस बार भी देवी सिंह भाटी पर विश्वास जताते हुए उनके पौत्र अंशुमान सिंह को चुनाव मैदान में उतारा है।

नोखा: पति बने विधायक, इस बार पत्नी को टिकट

रामेश्वर डूडी नोखा विधानसभा क्षेत्र से वर्ष 2013 में विधायक चुने गए। वे प्रधान, सांसद और विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष भी रहे हैं। प्रदेश में कांग्रेस नेताओं में भी उनकी विशेष पहचान है। रामेश्वर डूडी का नोखा की राजनीति में विशेष प्रभाव बना हुआ है। इस बार रामेश्वर डूडी अस्वस्थ हैं। कांग्रेस पार्टी ने डूडी परिवार पर ही विश्वास जताया है। उनकी पत्नी सुशीला डूडी को नोखा विधानसभा क्षेत्र में कांग्रेस प्रत्याशी बनाया गया है।

नोखा: पिता दो बार निर्दलीय विधायक, पुत्र भाजपा-कांग्रेस से रहे विधायक

नोखा की राजनीति में 50 के दशक से रूपाराम पंवार का प्रभाव रहा है। वे तहसील सरपंच रहने के साथ-साथ नोखा-मगरा विधानसभा और नोखा विधानसभा से दो बार निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में विधायक चुने गए। रूपाराम के बाद उनके पुत्र रेवंत राम पंवार दशकों से राजनीति में सक्रिय हैं। रेवंत राम पंवार वर्ष 1993 में भाजपा के टिकट से चुनाव लड़े व विधायक बने। वर्ष 1998 में कांग्रेस के टिकट से चुनाव मैदान में उतरे व जीत हासिल की। इस बार पंवार कोलायत विधानसभा क्षेत्र में रालोपा प्रत्याशी के रूप में चुनाव मैदान में हैं।

कोलायत: पहले पिता उतरे चुनावी मैदान में, पुत्र दो बार बन चुके हैं विधायक

कोलायत विधानसभा क्षेत्र में रुघनाथ सिंह भाटी परिवार का विशेष प्रभाव रहा है। रुघनाथ सिंह भाटी इस क्षेत्र से कांग्रेस के टिकट पर दो बार चुनाव मैदान में उतरे, लेकिन जीत हासिल नहीं हुई। रुघनाथ सिंह के पुत्र भंवर सिंह भाटी वर्ष 2013 में कोलायत विधानसभा क्षेत्र में कांग्रेस के टिकट से चुनाव मैदान में उतरे व जीत हासिल की। वर्ष 2018 में भी भंवर सिंह ने जीत हासिल की। कांग्रेस ने इस बार भी भंवर सिंह पर विश्वास जताते हुए फिर चुनाव मैदान में उतारा है।