
rajasthan ka ran
विमल छंगाणी/बीकानेर. १९५०-६० के दशक में राजनीतिक पार्टियों की जीत-हार की प्रतिस्पर्धा के बीच आमजन की चुनावों के प्रति दीवानगी देखते ही बनती थी। आज भले ही पार्टियों और उम्मीदवारों के बीच चुनावी प्रतिस्पद्र्धा बढ़ गई हो, लेकिन उस दौर में पार्टियों के अधिकृत उम्मीदवारों के साथ निर्दलीय उम्मीदवारों की लोकतंत्र के उत्सव में भागीदारी, हास्यविनोद, गीत, कविता और मुक्तकों के माध्यम से होती थी।
उम्मीदवारों के समर्थक टोलियों के रूप में गली-गली, चौक-चौराहों में पहुंचकर गीत, कविताओं के माध्यम से न केवल प्रत्याशी का प्रचार करते, बल्कि विपक्षी पार्टियों, उम्मीदवारों पर कटाक्ष करते भी नहीं थकते थे। उस दौर के साक्षी रहे नटवरलाल व्यास बताते है कि १९५०, ६० के दशक में हुए चुनावों में गीत, कविताएं प्रचार का प्रमुख माध्यम थीं। सभाओं के साथ-साथ गली-मोहल्लों, चौक-चौराहों पर इनकी गूंज रहती थी।
उस दौर में शहर के कई कवियों ने आमजन की पीड़ाओं, राजनीति, राजनेताओं की ज्यादतियों, गलत निर्णयों, शासन-प्रशासन की खामियों आदि पर जमकर लेखनी चलाई। पार्टियों और प्रत्याशियों पर करारे व्यंग्य भी किए। वे कविताएं और गीत आज भी लोगों की जुबान पर हैं।
'अरे ठगोरा बण बैठ्या
५० के दशक में हुएचुनाव में 'अरे ठगोरा बण बैठ्या, भारत रा सरताज रे..., भुखमरी महंगाइ बढग़ी, रोवे जनता सारी, पढि़या लिखिया गोता खावै, फैल र्यी बेकारी...Ó के माध्यम से सरकार पर किए व्यंग्य आज भी लोगों की जुबां पर है। कुछ एेसे ही व्यंग्य वहीं 'नेताओं थे मती दिखाओ नोट रेÓ, 'हंशा हा पर चीचड़ बणकर कुर्सी संू जा चैंट ग्याÓ, और 'लूट खोस खावण वाळो रा मोटा कोठी बंगला हैÓ सरीखे गीत खास रहे थे। इसी दौर में जनकवि बुलाकी दास बावरा की ओर से सन् १९६२ में लिखी कविता 'किसे छलेगी और न जाने किन-किन को ललचाएगी, जाने किसको 'मत की दुल्हनÓ वरमाला पहनाएगीÓ शहरवासी आज भी गुनगुनाते हैं।
तांगों से प्रचार
५०, ६० के दशक में उम्मीदवार समर्थकों की पैदल टोलियां, तांगा-घोड़ा प्रचार का प्रमुख माध्यम थे। व्यास बताते है कि उम्मीदवार और पार्टी समर्थकों की टोलियां चौक-चौराहों, मोहल्लों में स्थित पाटों पर खडे़ होकर गीत, कविताएं और मुक्तक सुनाते थे।
Published on:
28 Sept 2018 08:45 am
