
बीकानेर में है राजस्थान की अनूठी गणगौर
बीकानेर. गणगौर प्रदेश का प्रमुख पर्व है। छारंडी के दिन से ही इसकी शुरूआत हो जाती है। एक माह से अधिक समय तक चलने वाले इस पर्व में मां पार्वती और भगवान शिव के प्रतीक रूप में ईसर और गवर की पूजा-अर्चना घर-घर होती है। जगह-जगह मेले भरते है और पूर्व राजपरिवारों की गणगौर सवारी शाही लवाजमें के साथ निकलती है।
इस दौरान शहर से गांव-गांव तक गणगौरी गीतों की गूंज रहती है। गणगौर उत्सव के दौरान वैसे तो गणगौर प्रतिमाओं की अपनी-अपनी विशिष्ट पहचान और इतिहास जुड़ा रहता है, लेकिन बीकानेर के बारह गुवाड़ चौक में भरने वाले दो दिवसीय बारहमासा गणगौर मेले के दौरान पूजन की जाने वाली आलूजी की प्राचीन गणगौरे न केवल प्रदेशभर में अनूठी है बल्कि विशिष्ट बनावट और मिट्टी कुट्टी से बनी होने के कारण अपनी अलग पहचान रखती है। करीब डेढ सौ साल पुरानी इन गणगौर प्रतिमाओं में ईसर और गवर के साथ-साथ भगवान कृष्ण, भगवान गणेश और सिर पर कलश धारण किए पणिहारी की प्रतिमाएं भी है, जिनके प्रति शहरवासियों की विशेष आस्था और श्रद्धा है।
चटकीले रंग, 24 इंच तक का आकार
आलूजी की गणगौर प्रतिमाएं विशेष बनावट के साथ अपने चटकीले रंग और आकार के कारण भी सभी को आकर्षित करती है। आलूजी के वंशज ईश्वर दास छंगाणी के अनुसार भगवान गणेश की प्रतिमा सिंदूरी रंग की है। बडे नयन, ललाट पर तिलक और एकदंती है। वहीं भगवान कृष्ण की प्रतिमा श्यामल रंग, सिर पर मोर पंख, एक हाथ में बांसुरी धारण किए है। पणिहारी की प्रतिमा गौर वर्ण की है। सभी प्रतिमाओं का आकार 22 से 24 इंच तक का है। सिर से नाभी तक इनकी बनावट है। इनको विशेष स्टैण्ड पर मेले के दिन पारम्परिक वस्त्र और आभूषणों से श्रृंगारित कर विराजित किया जाता है। गवर और ईसर की प्रतिमाएं भी २४ इंच तक व नाभि तक बनावट है।
मिट्टी व कागज की लुगदी से बनी
आलूजी के वंशज ईश्वर दास बताते है कि यह प्राचीन गणगौर प्रतिमाएं चिकनी मिट्टी, कागज की लुगदी, दाना मेथी, गोंद, राल आदि सामग्रियों से तैयार की गई है। मिट्टी और कागज लुगदी से बनी होने के कारण हर साल इन प्रतिमाओं का रंग करवाना होता है। यह आकार में करीब दो फुट की है, लेकिन वजन अधिक है। प्राचीन और मिट्टी से बनी होने के कारण इनकी विशेष देखभाल की जाती है।
महिलाओं में विशेष श्रद्धा
आलूजी की बारहमासा की अद्भुत गणगौरों के प्रति महिलाओं में विशेष आस्था और श्रद्धा भाव है। बारहमासा व्रत पूजन करने वाली महिलाएं हर साल इन गणगौर प्रतिमाओं का पूजन कर मनोकामना करती है। मनोकामना की पूर्ति होने पर वस्त्र, आभूषण, प्रसाद, श्रीफल, उपहार आदि भेंट करती है। बालिकाएं और महिलाएं इन गणगौर प्रतिमाओं के समक्ष गीत और नृत्य प्रस्तुत करती है। दो दिवसीय मेला भरता है। इस बार २३ व २४ अप्रेल को मेला भरेगा।
Published on:
02 Apr 2021 11:30 am
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