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बीकानेर. स्कूली बच्चों को दूध पिलाने की राज्य सरकार की योजना शिक्षकों के लिए सिर दर्द बनती जा रही है। शिक्षा विभाग की उदासीनता के चलते दूध पिलाने व पोषाहार पकाने में होने वाला खर्च शिक्षकों पर भारी पड़ रहा है। पिछले पांच माह से स्कूलों के दूध व पोषाहार के करोड़ों रुपए बकाया पड़े हैं।
एेसे में आने वाले दिनों में शिक्षकों के लिए दूध पिलाना टेढ़ी खीर साबित हो सकता है। सूत्रों की मानें तो हर माह शिक्षकों को अपनी जेब से ही दूध का पैसा चुकाना पड़ रहा है। मार्च से लेकर जुलाई तक भुगतान के लिए बजट ही नहीं मिला है।
बजट के बाद भी नहीं मिला पैसा
राजस्थान शिक्षक संघ (शेखावत) के प्रदेश मंत्री श्रवण पुरोहित ने रोष जताते हुए बताया कि दूध व पोषाहार के करोड़ों रुपए बकाया पड़े हैं। इसके बाद भी शिक्षा अधिकारी अनदेखी कर रहे हैं। जिले को चार करोड़ रुपए का बजट पोषाहार के लिए और ढाई करोड़ रुपए का बजट दूध के लिए आया हुआ है, लेकिन अभी स्कूलों के खातों में जमा नहीं हुआ।
स्थिति में सुधार नहीं हुआ तो योजना बंद होने के कगार पर आ जाएगी। राजस्थान शिक्षक संघ भगतसिंह के प्रदेश संरक्षक किशोर पुरोहित ने चिकित्सा व स्वास्थ्य अधिकारी से स्कूलों में दूध की जांच कराई जाने की आवश्यकता जताई है।
कर रहे स्वीकृत
अक्षयपात्र योजना का बजट स्वीकृत कर रहे हैं। इसके अलावा दूध का भुगतान भी आएगा। यथास्थिति की अपडेट जानकारी ली जाएगी।
इस्माइल खान, जिला शिक्षा अधिकारी (प्रारम्भिक शिक्षा), बीकानेर
जिले में १९८० विद्यालय
जिले में प्राथमिक, उच्च प्राथमिक, माध्यमिक व उच्च माध्यमिक स्तर के १९८० विद्यालय हैं। इसमें कथा आठवीं तक के बच्चों को दूध पिलाने की योजना पिछले सत्र में शुरू हुई थी, लेकिन अब बजट के अभाव में योजना स्कूलों के लिए गले की फांस बनती जा रही है। जानकारों की मानें तो एक माह में प्रत्येक स्कूल में दूध पिलाने की एवज करीब ६५ लाख रुपए का खर्च आता है। औसतन एक विद्यालय में ७०-८० विद्यार्थियों को दूध पिलाया जाता है, लेकिन जिले में मार्च से अब तक भुगतान नहीं हुआ है।
Published on:
25 Jul 2019 03:52 pm
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