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कालापानी की सजा के दौरान वीर सावरकर पर फांसी देखने की थी बाध्यता

आज विनायक दामोदर सावरकर जयंती पर विशेष: सावरकर का जन्म 28 मई 1883 को महाराष्ट्र के नासिक जिले के भगूर गांव में चितपावन ब्राह्मण जमींदार परिवार में हुआ था। प्रारम्भिक शिक्षा नासिक में पूरी करने के बाद पुणे की फार्युसन कॉलेज में विधि छात्र के रूप में दाखिला लिया।

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कालापानी की सजा के दौरान वीर सावरकर पर फांसी देखने की थी बाध्यता

कालापानी की सजा के दौरान वीर सावरकर पर फांसी देखने की थी बाध्यता

गेस्ट राइटर -एडवोकेट अशोक भाटी, बीकानेर

भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन के महान क्रांतिकारियों की फेहरिस्त में एक देदिप्यमान शिक्षाविद्, विद्वान अधिवक्ता, लेखक का नाम बड़े गर्व एवं सम्मान के साथ लिया जाता है, वे हैं विनायक दामोदर सावरकर। सावरकर का जन्म 28 मई 1883 को महाराष्ट्र के नासिक जिले के भगूर गांव में चितपावन ब्राह्मण जमींदार परिवार में हुआ था। प्रारम्भिक शिक्षा नासिक में पूरी करने के बाद पुणे की फार्युसन कॉलेज में विधि छात्र के रूप में दाखिला लिया। लेकिन इंग्लेण्ड के राजा के प्रति वफादारी की शपथ की तत्कालीन परम्परा के विरोध के कारण उन्हें डिग्री से निलम्बित कर दिया गया था।

युवावस्था में ही अपने उग्र राजनीतिक विचारों एवं 1905 के अंग-भंग आन्दोलन में सक्रिय जुड़ाव एवं विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार के कारण विनायक दामोदर सावरकर स्वतन्त्रता आन्दोलन के क्रांन्तिकारी के रूप में ब्रिटानी हकुमत की आंखों में खटकने लगे ।

1910 में नासिक (महाराष्ट्र) के अंग्रेज अधिकारी की हत्या में संलिप्तता के आरोप में सावरकर को लंदन के विक्टोरिया स्टेशन से गिरफ्तार कर जल मार्ग से भारत लाने का निर्णय हुआ। लंदन से भारत लाते समय फ्रांस की समुद्री सीमा में सावरकर अंग्रेज पुलिस अधिकारियों को चकमा देकर समुन्द्र में कूद गए। लेकिन दुर्भाग्यवश पुन: गिरफ्तार कर लिए गए। गिरफ्तारी विदेशी राष्ट्र फ्रांस की भूमि पर होने से विनायक दामोदर सावरकर का मामला अंतरराष्ट्रीय न्यायालय 'हैगÓ में चला। इस घटनाक्रम ने युरोपीय समुदाय का ध्यान भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन की ओर खींचा। परिणाम फिर ढाक के तीन पात हुए और सावरकर को भारत लाकर २५-२५ वर्ष के दो-दो आजीवन कारावास की सजा तथा सजा भुगतने कालापानी यानि अण्डमान निकोबार सैल्यूलर जेल भेज दिया गया।

1910 से 1920 तक अण्डमान निकोबार की सैल्यूलर जेल की कोठरी नं. 52 में सावरकर को यातनाएं दी गई। यह कोठरी सैल्यूलर जेल के फांसी गृह के ठीक ऊपर स्थित थी। सैल्यूलर जेल में हर साल 4 से 5 फांसी दी जाती थी। जिन्हें सावरकर को देखने के लिए पाबन्द किया जाता रहा।

काले पानी की सजा के बाद 1921 को सावरकर को रतनागिरी (महाराष्ट्र) जेल में स्थानान्तरित कर दिया गया। वहां से १९२४ में कुछ प्रतिबंधों के साथ रिहाई दी गई। विनायक दामोदर सावरकर ने अपनी पुस्तक 'द इण्डिया वार ऑफ इंडीपन्डेन्सÓ में 1857 की क्रांति के स्वतन्त्रता संग्राम का सटीक उल्लेख कर ब्रिटिश हुकूमत को हिला दिया। अंग्रेजों ने इस पुस्तक के प्रकाशन व वितरण पर प्रतिबंध लगा दिया।

राष्ट्र के प्रति बिना शर्त श्रद्धा के भाव से अनवरत कार्य करते हुए दो बार आजीवन कारावास की सजा भुगतने के बाद भी सावरकर सामाजिक जीवन में पुन: लौटे और स्वतन्त्रता आन्दोलन में जुट गए। जीवनपर्यन्त विनायक दामोदर सावरकर सामाजिक जीवन में अस्पश्र्यता के विरूद्ध एवं अछुतोद्धार एवं महिला व बालिका शिक्षा का प्रचार-प्रसार किया। भारतीय राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे के मध्य में धर्मचक्र लगाने का सुझाव भी डॉ. राजेन्द्र प्रसाद को सावरकर ने ही दिया था।

विरोधी विचारधारा के तत्कालीक स्थापित लोगों ने सावरकर पर आरोप गढऩे एवं उनके तिरस्कार की भी कोई कसर नहीं छोड़ी। यहां तक कि सैल्यूलर जेल में कालापानी की सजा के दौरान माफीनामा पेश करने एवं महात्मा गांधी की हत्या के बुनियाद आरोप भी मढ़े गए। अण्डमान निकोबार की सैल्यूलर जेल प्रशासन के पास सावरकर द्वारा अंग्रेजों को रिहा करने के बदले में माफीनामा देने सम्बन्धी कोई दस्तावेज नहीं है। महात्मा गांधी की हत्या की जांच के लिए गठित कपूर आयोग ने भी अपनी रिपोर्ट में गांधी की हत्या में सावरकर की लिप्तता से इनकार किया था।

आज भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन के इस महान यौद्धा की 137वीं जयन्ती पर श्रद्धापूर्वक नमन करते हुए आशा करते हैं कि नई पीढ़ी सावरकर के वीर तत्व एवं चिंतनशीलता को अपने जीवन में आत्मसात् करने का प्रयास करेंगे।