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हाल ए शहर: 57 फीसदी कचरे का निस्तारण नहीं, 35 फीसदी तक नहीं पहुंची डोर टू डोर सेवा

पत्रिका रिसर्च स्टोरी: बीकानेर के घरेलू, बाजार और औद्योगिक तीनों के कचरे के संग्रहण और निस्तारण पर करना होगा काम। शोध में सामने आया कि डंपिंग यार्ड और उसमे नियमित कचरा निस्तारण कार्य नहीं होने से शहर के 37 प्रतिशत परिवार दुर्गंध या बदबू से परेशान हैं।

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बीकानेर. स्मार्ट सिटी बनने के लिए पहली आवश्यकता है साफ-सफाई और ठोस अपशिष्ट (कचरा) का निस्तारण। इस मापदंड पर बीकानेर शहर अभी बहुत पीछे है। आमजन में जागरूकता लाने से लेकर कचरे के संग्ररहण और निस्तारण के लिए आधुनिक तकनीक को अपनाने जैसे कदम उठाने होंगे।

सिटी का बसावट क्षेत्र 100 वर्ग किलोमीटर को पार कर चुका है। यहां रोजाना 330 मीट्रिक टन कचरा पैदा हो रहा है। इसे एकत्र कर डंपिंग यार्ड ले जाकर सही तरीके से निस्तारण महज 42.50 प्रतिशत का ही हो पा रहा है। यह जमीनी हकीकत महाराजा गंगासिंह विश्वविद्यालय के अधीन एक छात्रा के किए गए शोध कार्य में सामने आई है।

शहर के गली मोहल्लों से लेकर बाहरी क्षेत्र में कचरे के डंपिंग यार्ड पर जाकर की गई रिसर्च में ठोस कचरा उत्पन्न होने से लेकर निस्तारण तक की खामियों को चिन्हित किया गया। सामने आया कि घरों में कचरा संग्रहण के लिए पुरानी बाल्टी का उपयोग होता है। इनकी तादाद 75 प्रतिशत के करीब है। चिंता 25.30% घरों की है। जहां कचरा प्लास्टिक की थैलियों में संग्रहण होता है। निगम की ओर से सार्वजनिक कचरा संग्रहण कंटेनर नहीं रखे होने से करीब 57.50% घरों से ठोस कचरा सार्वजनिक कचरा कंटेनरों में नहीं डाला जाता है। यह आस-पास खुली जगह, खाली भूखंडों, सड़क किनारे ढेर के रूप में पड़ा रहता है।

शहर के विस्तार की यह रफ्तार

शोध में सामने आया कि 20वीं सदी के मध्य तक परकोटे की चारदीवारी तक सीमित शहरी क्षेत्र करीब 2.67 वर्ग किलोमीटर था। वर्ष 1971 तक बढ़ कर 22.56 वर्ग किलोमीटर हो गया। वर्ष 2001 में विकसित क्षेत्र 62.18 वर्ग किलोमीटर और 2011 में 155.02 वर्ग किमी पर पहुंच गया। शोध में रिमोट सेंसिंग और जीआईएस सॉफ्टवेयर का उपयोग करने पर पता चला कि 1991 से 2018 के बीच 27 वर्षों में शहर का बसावट क्षेत्र 35.50 से 74.70 वर्ग किलोमीटर तक यानी दोगुना से अधिक हो गया। अब ताजा अनुमान के अनुसार करीब 100 वर्ग किलोमीटर हो चुका है।

प्रतिदिन 123 टन औद्योगिक अपशिष्ट

बीकानेर में औद्योगिक क्षेत्र में 27.12 प्रतिशत कचरा ऊनी धागा और कालीन उद्योग से, 15.89 प्रतिशत खाद्य इंडस्ट्री रसगुल्ला, भुजिया और पापड़ निर्माण के दौरान, 13.8 प्रतिशत कृषि उत्पादों से हो रहा है। इसमें आटा मिलें, दाल मिलें और मूंगफली तेल मिलें भी शामिल हैं। सिरेमिक, इलेक्ट्रिक इंसुलेटर, चाइना क्ले, प्लास्टर ऑफ पेरिस जैसे उद्योगों से 12 प्रतिशत कचरा निकल रहा है। रोजाना कम से कम 123 टन औद्योगिक ठोस अपशिष्ट शहर में पैदा हो रहे हैं। इसमें से 72 टन का ही डिस्पोजल होता है। शेष औद्योगिक क्षेत्रों, रेलवे लाइनों और मुख्य सड़क मार्गों के किनारे डाल दिया जाता है।

37 प्रतिशत परिवार बदबू से परेशान

शोध में सामने आया कि डंपिंग यार्ड और उसमे नियमित कचरा निस्तारण कार्य नहीं होने से शहर के 37 प्रतिशत परिवार दुर्गंध या बदबू से परेशान हैं। उच्च आय वाले क्षेत्रों में इनका प्रतिशत 10 रहा, लेकिन निम्न आय वाले क्षेत्रों में यह काफी ज्यादा है। इसके लिए सीवरेज की खराब हालत भी जिम्मेदार है।

सकारात्मकता भी...कचरे से खाद बनाने को तैयार

सर्वे में सामने आया कि बीकानेर में तीन चौथाई परिवारों ने खाद बनाने के कार्यक्रम में शामिल होने की सहमति दी। इस दौरान 10 में से 9 घर खाद बनाने के लिए गीले कचरे को अन्य सूखे कचरे से अलग करने के लिए तैयार हुए।

नहीं पहुंची कचरा संग्रहण सेवा

शहर में कचरे की डोर-टू-डोर संग्रह सेवा भी समान रूप से नहीं है। गरीब बस्तियों या मोहल्लों में केवल 10 प्रतिशत क्षेत्र में यह सुविधा है। मध्यम आय वाले क्षेत्रों में 25 प्रतिशत और उच्च आय वाले क्षेत्रों में 65 फीसदी डोर-टू-डोर कचरा संग्रह सेवा पहुंच रही है। करीब 16.58% परिवारों ने ठोस कचरा संग्रह प्रक्रिया के प्रति असंतोष व्यक्त किया है।

शिकायत पर निवारण नहीं

फील्डवर्क में सामने आया कि अधिकांश परिवार अपने क्षेत्रों में तैनात सफाई कर्मचारियों की संख्या से असंतुष्ट हैं। निम्न आय वाले क्षेत्रों में 10 प्रतिशत और मध्यम आय वाले क्षेत्रों में 17 प्रतिशत परिवार ही संतुष्ट हैं। जबकि उच्च आय वाले क्षेत्रों में 58 प्रतिशत परिवार संतुष्ट मिले। लोगों ने नगर निगम के सफाई विभाग में शिकायत निवारण तंत्र के पास शिकायत दर्ज कराने पर निस्तारण नहीं होने की शिकायत की।

जागरूकता, जुड़ाव और तकनीक अपनाने की जरूरत

टॉपिक एक्सपर्ट...डॉ. हेमलता सहल, शोधकर्ता ठोस कचरा प्रबंधन एवं प्रभाव

शहर में ठोस कचरा संग्रहण और निस्तारण के लिए भौगोलिक सूचना प्रणाली (जीआईएस), रिमोट सेंसिंग और डेटा एनालिटिक्स जैसी तकनीकों को अपनाना होगा। ये उपकरण अपशिष्ट उत्पादन पैटर्न में वास्तविक समय की जानकारी प्रदान करेंगे। इससे कचरा संग्रह की मॉनिटरिंग और समान रूप से संसाधन आवंटन की खामियां दूर कर सकते हैं। अपशिष्ट प्रबंधन में पारदर्शिता और जवाबदेही तय करने की जरूरत है।

दूसरा जरूरी पहलू सामुदायिक भागीदारी का है। लोग गीला व सूखा कचरा अलग-अलग संग्रह करेंगे, तो निस्तारण बेहतर हो सकेगा। कचरे का निस्तारण वैज्ञानिक रूप से निर्मित सैनिटरी लैंडफिल (डम्पिंग यार्ड) में करने की जरूरत है। कचरे के अवैध डंपिंग पर अंकुश जरूरी है। गीला व सूखा कचरा अलग-अलग एकत्र करना शुरू करें। जैविक और अन्य कचरे को अलग-अलग कर खाद बनाने के काम में लिया जा सकेगा। घर पर कचरे को अलग-अलग करने के लिए लोगों को जागरूक करने की आवश्यकता है। इससे वे खाद बनाने के कार्यक्रम में स्वेच्छा से जुड़ेंगे।