
बीकानेर. रावी-व्यास के पानी में प्रदेश के हिस्से को लेकर चल रहे विवाद का निस्तारण करने के लिए गठित न्यायिक ट्रिब्यूनल अपनी रिपोर्ट तैयार करने के लिए दो दिन से राजस्थान के दौरे पर है। दौरे के दूसरे दिन ट्रिब्यूनल के दल ने शुक्रवार को इंदिरा गांधी नहर परियोजना का व्यवस्थित नहरी तंत्र को देखा। पानी की एक-एक बूंद का सिंचाई और पेयजल के लिए सदुपयोग देख इस दल के सदस्य भी प्रदेश के मुरीद हो गए।
अंतरराज्यीय नदी जल विवाद को लेकर गठित इस ट्रिब्यूनल के अध्यक्ष सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति विनीत सरन है। न्यायाधीश सुमन श्याम व न्यायाधीश नवीन राव के साथ राजस्थान, पंजाब और हरियाणा सरकार के प्रतिनिधि सदस्य के रूप में शामिल है। राजस्थान दौरे के दौरान एसीएस अभय कुमार, मुख्य अभियंता प्रदीप रुस्तगी, विवेक गोयल अतिरिक्त सचिव अमरजीत मेहरडा सहित कई अधिकारी भी साथ रहे।
दल ने आइजीएनपी के द्वितीय चरण को शुक्रवार को देखा। बीकानेर से शोभासर माइनर को देखने पहुंचे। इसके बाद लिफ्ट नहर परियोजना के सिस्टम को देखा। यहां से आइजीएनपी की आरडी 931 गए और मुख्य नहर से निकलने वाली नहरों के सिस्टम और सिंचाई तंत्र की जानकारी ली। फिर आरडी 1254 पर बने हैड को भी देखा। इसके बाद यह दल देर शाम जैसलमेर पहुंच गया। शनिवार व रविवार को आइजीएनपी के आगे के सिस्टम को देखने के बाद 8 मार्च को वापस जाएगा।
राजस्थान की ओर से नहरी पानी की मांग बार-बार उठाने के पीछे के कारणों की भी जानकारी ली। इस दौरान दल के सदस्यों ने देखा कि कितना बड़ा नहरी नेटवर्क है। सीधे तौर पर चार जिलों को सिंचाई पानी देने के साथ ही प्रदेश के रेगिस्तानी भूभाग में 12 जिलों में बसे लाखों लोगों को पेयजल उपलब्ध कराया जा रहा है। सबसे अहम बात यह रही कि नहरी पानी की एक बूंद भी कही व्यर्थ में जाते नहीं मिली। जबकि रावी, व्यास, सतलुज का पानी लेने वाले अन्य राज्य पंजाब, हरियाणा में कई जगह पानी सेम नालों और व्यर्थ में बहता है। दूसरी तरफ राजस्थान में जनता पानी का अमृत की तरह उपयोग कर रही है।
सुभाष सहगल, सिंचाई तंत्र के विशेषज्ञ
रावी-व्यास नदियों के जल को लेकर तीन प्रमुख समझौते 1935, 1955, 1982 में हुए। समझौते के अनुसार राजस्थान को 1.11 एमएएफ पानी देश के विभाजन से पूर्व और 8.60 एमएएफ पानी आजादी के बाद के समझौते के तहत देना तय हुआ। साल 1997, 1998 और 1999-2000 में ही राजस्थान को 9 एमएएफ पानी मिला। इसके बाद के सालों में 8 एमएएफ पानी भी नहीं मिल रहा है। जबकि दूसरी तरफ हर साल लाखों क्यूसेक पानी पाकिस्तान की तरफ छोड़ दिया जाता है। पानी के विवाद का निपटारा करने के लिए न्यायाधिकरण का गठन 1986 को किया गया। इसने एक साल में ही केंद्र सरकार को प्रारंभिक रिपोर्ट भी दी। परन्तु राजनीतिक कारणों और राजस्थान की मजबूत पैरवी के अभाव में आज तक हमारे किसानों और जनता का हक नहीं मिल पाया है। अब ट्रिब्यूनल हमारे पूरे तंत्र को देख कर रिपोर्ट देगा तो उम्मीद है, पूरा पानी राजस्थान की नहरों को मिलने का रास्ता खुलेगा।
Published on:
07 Mar 2026 05:15 pm
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