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बीकानेर में रियासत काल से चली आ रही अनूठी परंपरा, यहां पुरुष सिर पर गणगौर प्रतिमा रख लगाते हैं दौड़

Ganguar Festival: गणगौर दौड़ का आयोजन न केवल अनूठा है, अपितु हर किसी को रोमांचित भी करता है।

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विमल छंगाणी
बीकानेर। बीकानेर में गणगौर के प्रति पुरुषों की आस्था, भक्ति और श्रद्धा देखते ही बनती है। धुलंडी के दिन से ही यहां पुरुषों की मंडलिया गणगौर के पारंपरिक गीतों का गायन शुरू कर देते हैं। 12 दिवसीय गणगौर पूजन के दौरान चैत्र शुक्ला चतुर्थी को गणगौर दौड़ का आयोजन न केवल अनूठा है, अपितु हर किसी को रोमांचित भी करता है।

रियासतकाल से गणगौर दौड़ यहां चौतीना कुआं से हो रही है। इसमें पुरुष गणगौर प्रतिमा को अपने सिर पर विराजित कर दौड़ लगाते हैं। दौड़ते हुए भुजिया बाजार पहुंचने पर यह संपन्न होती है। इस बार गणगौर दौड़ का आयोजन एक अप्रेल को होगा। भादाणी समाज किशन लाल भादाणी के अनुसार गणगौर प्रतिमा दर्शन-पूजन के लिए शीतला अष्टमी को बाहर निकाली जाती है।

रंगाई व शृंगार के बाद चैत्र शुक्ल चतुर्थी तक पूजन उत्सव चलता है। इस दौरान शहरवासी इस गणगौर प्रतिमा के दर्शन-पूजन कर पानी पिलाने, भोग अर्पित करने, धोती ओढ़ाने व खोळा भराई की रस्म करते हैं। गणगौर प्रतिमा बीकानेर में भादाणी जाति के प्रत्येक मकान पर खोळा भरवाने के लिए पहुंचती है।

दौड़ते हुए देते एक-दूसरे को चैत्र शुक्ल चतुर्थी को जैसे ही पूर्व बीकानेर राज परिवार की गणगौर शाही लवाजमें के साथ चौतीना कुआं के नजदीक पहुंचती है, भादाणी समाज की गणगौर को युवक अपने सिर पर रखकर दौड़ लगाते हैं। कोटगेट की ओर दौड़ने के दौरान युवक गणगौर एक-दूसरे का देते रहते हैं। एक बार दौड़ शुरू होने के बाद किसी भी हालत में यह रूकती नहीं है।

इस कारण दौड़ रही गणगौर

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में इतिहास विभाग के विभागाध्यक्ष रहे प्रोफेसर भंवर भादाणी बताते हैं कि बीकानेर के महाराजा रायसिंह के शासनकाल के दौरान यह गणगौर प्रतिमा जोधपुर से बीकानेर आई थी। बीकानेर राज्य के दीवान कर्मचन्द बच्छावत ने उस दौर में हुए एक आक्रमण के दौरान यह गणगौर भादोजी को दी थी। भादोजी इस गणगौर को लेकर दौड़ते हुए निकल गए थे। उसी घटना की स्मृति में इस दौड़ का आयोजन हो रहा है।

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