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… और इधर आगोर पर गौर नहीं, छटपटा रहे सिकुड़ते सरोवर

विषम परिस्थितियों के बावजूद जीवन के लिए उपयोगी रहे तालाब और तलाइयां आज बिना पानी के छटपटा रहे हैं। इनकी आगोर सिकुड़ रही है। तालाब में पहुंचने वाले बारिश के पानी के मार्ग अवरुद्ध हो रहे हैं। साल दर साल तालाबों की आगोर भूमि पर अतिक्रमण बढ़ रहे हैं। शासन-प्रशासन मूक दर्शक बनकर सिकुड़ती आगोर को महज देखे जा रहा है। आगोर संरक्षण के नियम कहीं कागजो में दफन नजर आ रहे हैं।

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... और इधर आगोर पर गौर नहीं, छटपटा रहे सिकुड़ते सरोवर

... और इधर आगोर पर गौर नहीं, छटपटा रहे सिकुड़ते सरोवर

तालाब, तलाइयां, कुए और बावड़ी हमारे पारंपरिक जल स्त्रोत हैं। ये न केवल पेयजल के साधन रहे हैं, बल्कि हमारे लोक जीवन से भी जुड़े रहे हैं। इनके आस-पास जीव-जन्तुओं, पशु-पक्षियों और पेड़- पौधों को फलने-फूलने और पनपने के भी पर्याप्त अवसर मिले हैं। पारंपरिक जल स्त्रोत सूखे गलों को तर कर मानव जीवन के लिए अमृत तुल्य रहे हैं।

विषम परिस्थितियों के बावजूद जीवन के लिए उपयोगी रहे तालाब और तलाइयां आज बिना पानी के छटपटा रहे हैं। इनकी आगोर सिकुड़ रही है। तालाब में पहुंचने वाले बारिश के पानी के मार्ग अवरुद्ध हो रहे हैं। साल दर साल तालाबों की आगोर भूमि पर अतिक्रमण बढ़ रहे हैं। शासन-प्रशासन मूक दर्शक बनकर सिकुड़ती आगोर को महज देखे जा रहा है। आगोर संरक्षण के नियम कहीं कागजो में दफन नजर आ रहे हैं।

बुझाते थे प्यास अब खुद प्यासे

तालाब-तलाईयां सूखे गलों को तर कर जीवन बचाते थे। आज लगातार सिकुड़ रही आगोर के कारण तालाब-तलाइयों में लगभग नहीं के बराबर पानी पहुंच पा रहा है। वे सूखे पड़े रहते हैं। कभी हर किसी की प्यास बुझाने वाले तालाब अब खुद प्यासे दिखाई देते हैं।

अब सुनसान पड़े

95 वर्षीय कन्हैया लाल ओझा बताते हैं कि दशकों पहले शहर के तालाब, तलाइयां बारिश के पानी से लबालब रहते थे। आस-पास रौनक रहती थी। तालाबों में पानी गायब होने के साथ अब रौनक भी नहीं है।

जिम्मेदार मौन

शहर के तालाबों की आगोर पर अतिक्रमणों की जानकारी शासन-प्रशासन को भी है, लेकिन जिन पर आगोर में हो रखे अतिक्रमण पर अंकुश लगाने का जिम्मा है, वे ही मौन हैं। जनप्रतिनिधि वोटों की राजनीति के कारण चुप हैं।

सड़कें-मकान बने

शहर के तालाब-तलाइयों की आगोर भूमि पर अतिक्रमियों की नजर है। तालाब-तलाइयों की पाल से महज सौ-दो सौ मीटर तक की दूरी पर सड़कें निकल चुकी हैं। मकान बन गए हैं। दूर-दूर से तालाब-तलाइयों में आने वाले बारिश के पानी का मार्ग बंद हो चुका है। लगभग हर बड़े तालाब के आगोर परिसर में पक्के निर्माण हो चुके हैं। यह क्रम बदस्तूर जारी है।

ये हैं प्रमुख तालाब

रियासतकाल से 16 तालाब और करीब चार दर्जन तलाइयों की जानकारी मिलती है। इनमें संसोलाव तालाब, हर्षोल्लाव तालाब, महानन्द तालाब, धरणीधर तालाब, फूलनाथ तालाब, घड़सीसर तालाब, नृसिंह सागर तालाब, ब्रह्मसागर,देवी कुंड सागर, शिवबाड़ी, सूरसागर शामिल हैं। रयासतकाल में 16 तालाब और चार दर्जन से अधिक तलाईयां होने की जानकारी मिलती है।

आगोर भूमि पर हो रहे कब्जे

संसोलाव तालाब की आगोर भूमि को बचाने की कोशिशों में लगभग 20 वर्षों से जुटे मदन मोहन छंगाणी का कहना है कि तालाब की आगोर 348 बीघा 19 बिस्वा है। आगोर की लगभग 30 फीसदी भूमि पर अतिक्रमण हो चुका हैं। आगोर को बचाने का प्रयास चल रहा है। महानन्द पर्यावरण एवं विकास समिति के गणेश आचार्य के अनुसार महानन्द तालाब की आगोर भूमि पर अतिक्रमण हो रहे हैं। भूमि को बचाने का प्रयास चल रहा है। प्रशासन के अधिकारियों के ध्यान में इसे लाया गया है। हर्षोल्लाव तालाब, देवीकुंड सागर, शिवबाड़ी सहित विभिन्न तालाब-तलाइयों की आगोर की भी यही हालत है। यहां अतिक्रमण हो चुके हैं।