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प्लांटेशन पीआईएल पर वन विभाग की लापरवाही पर कोर्ट ने जाहिर की नाराजगी

जवाब नहीं दे पाया वन विभाग, 6 सप्ताह का अतिरिक्त समय मांगने पर मिला 2 सप्ताह का समय।

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बिलासपुर . छत्तीसगढ़ में वैज्ञानिक तरीके से वृक्षारोपण नहीं किए जाने और करोडों पौधों लगाने के बावजूद 3700 वर्ग कि.मी. जंगल कम हो जाने के मामले में रायपुर निवासी नितिन सिंघवी द्वारा दायर की गई जनहित याचिका में शासन के द्वारा जवाब प्रस्तुत नहीं कर पाने पर और जवाब देने के लिये 6 सप्ताह का अतिरिक्त समय मांगे जाने पर वन विभाग की लापरवाही पर न्यायमूर्ति प्रीतिंकर दिवाकर व न्यायमूर्ति संजय अग्रवाल की संयुक्त पीठ ने जवाब प्रस्तुत नहीं किये जाने पर नाराजगी जाहिर करते हुऐ दो सप्ताह में जवाब प्रस्तुत करने के लिये आदेशित किया। मामले की सुनवाई 2 जनवरी को हुई। गौरतलब है वर्ष 1986 में मध्यप्रदेश के समय से जारी प्लांनटेशन टेकनीक के अनुसार वृक्षारोपण हेतु जगह का चयन वृक्षारोपण करने के एक वर्ष पूर्व ही कर दिया जाना चाहिये तथा वैज्ञानिकों के अनुसार गर्मियों में ही वृक्षारोपण हेतु गड्ढें खुद जाने चाहिये तथा वृक्षों की देखरेख 5 वर्षों तक होनी चाहिये। वन विभाग ने 2013 में निर्देश दिये थे कि हर हालत में 20 जुलाई तक वृक्षारोपण कार्य पूर्ण हो जाना चाहिये तथा बरसात या विषम परिस्थितियों हो तो 31 जुलाई तक वृक्षारोपण किया जा सकता है परंतु इन प्रावधानों का पालन नहीं किया जा रहा है।

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भारत के नियंत्रक एवं महालेखानिरीक्षक ने भी आपत्ति की है कि वृक्षारोपण बिना योजना के कर दिया जाता है, स्थान का ध्यान यथोचित नहीं होता और वृक्षारोपण पश्चात् देख-रेख के लिये फण्ड भी नहीं दिये जाते। छत्तीसगढ़ में प्रतिवर्ष करोड़ों पौधों के वृक्षारोपण होने के बावजूद 15 वर्षों में छत्तीसगढ़ में जंगल कम होने के मामले में याचिका कर्ता ने कोर्ट को बताया है कि छत्तीसगढ़ निर्माण के पश्चात् लगातार वृक्षारोपण होने के बावजूद वर्ष 2001 से 2015 तक लगभग 3 प्रतिशत जंगल अर्थात् 3700 वर्ग कि.मी. जंगल कम हो गया है। वर्ष 2017 में 8 करोड़, वर्ष 2016 में 7 करोड़ 60 लाख, वर्ष 2015 में 10 करोड़ पौधे रोपित किये गये। याचिका में मांग की गई है कि उचित निर्देंश जारी किये जावें कि वृक्षारोपण पूर्ण: वैज्ञानिक तरीके से किया जावे तथा पौधों की उचित समय तक रख-रखाव एवं मानिटरिंग की जावें।

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