
Bilaspur News: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने प्रमोशन में आरक्षण पर बड़ा फैसला सुनाते हुए 2019 में जारी राज्य सरकार के आदेश को निरस्त कर दिया है। इससे पहले कोर्ट ने राज्य द्वारा प्रमोशन में आरक्षण के लिए जारी अधिसूचना पर रोक लगाई थी। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा, जस्टिस रविन्द्र कुमार अग्रवाल की बेंच ने फैसला देते हुए याचिका निराकृत कर दी है। कोर्ट ने फैसले में कहा कि पूर्ववर्ती सरकार ने आदेश को लागू करने में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के निर्देशों और संवैधानिक प्रावधान का पालन नहीं किया। सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट कहा है कि, प्रमोशन में आरक्षण देने के लिए हर विभाग से जातिगत डाटा एकत्रित कर केवल जिन्हें जरूरत है, उन्हीं एस-एसटी कर्मचारियों को इसका लाभ दिया जाना चाहिए। जबकि डाटा कलेक्ट करने का काम पूर्ववर्ती सरकार ने नहीं किया था।
पूर्व में कोर्ट ने लगाई थी शासन के आदेश पर रोक
बता दें कि पूर्व में याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने राज्य शासन की इस अधिसूचना पर रोक लगा दी थी। सुनवाई के दौरान 2 दिसंबर 2019 को शासन की तरफ से तत्कालीन महाधिवक्ता सतीशचंद्र वर्मा ने अधिसूचना तैयार करने में गलती होना स्वीकार किया था। इस गलती को सुधारने के लिए कोर्ट ने एक सप्ताह का समय दिया था। इस पर कोई खास अमल नहीं होने पर तत्कालीन चीफ जस्टिस की खंडपीठ ने अधिसूचना पर रोक लगा दी थी। साथ ही सरकार को नियमानुसार दो माह में फिर से नियम बनाने के आदेश दिए थे। कोर्ट ने आरक्षण पर लगी रोक के आदेश में संशोधन या फिर उसे रद्द करने की मांग भी खारिज कर दी थी।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले और संवैधानिक प्रावधान का पालन नहीं
प्रमोशन में आरक्षण को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया है कि राज्य एससी और एसटी कर्मचारियों को प्रमोशन में रिजर्वेशन देने से पहले क्वॉन्टेटिव (मात्रात्मक) डाटा जुटाने के लिए बाध्य हैं। बिना आंकड़े के नौकरियों में प्रमोशन में रिजर्वेशन नहीं दिया जा सकता है। इसके साथ ही कोर्ट ने कहा था कि प्रमोशन में रिजर्वेशन देने से पहले राज्य सरकारों को आंकड़ों के जरिए ये साबित करना होगा कि एससी-एसटी का प्रतिनिधित्व कम है। वहीं इस मामले पर समीक्षा अवधि केंद्र सरकार की ओर से निर्धारित की जानी चाहिए।
इससे पहले, शीर्ष अदालत ने कहा था कि वह एससी और एसटी को पदोन्नति में आरक्षण देने के अपने फैसले को फिर से नहीं खोलेगा क्योंकि यह राज्यों को तय करना है कि वे इसे कैसे लागू करते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा था कि 2006 के नागराज और 2018 के जरनैल सिंह मामले में संविधान पीठ के फैसले के बाद सुप्रीम कोर्ट कोई नया पैमाना नहीं बना सकती। प्रमोशन में आरक्षण से पहले उच्च पदों पर प्रतिनिधित्व के आंकड़े जुटाना बहुत आवश्यक है। हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने पाया कि राज्य शासन ने सुप्रीम कोर्ट के उक्त निर्देशों का पालन नहीं किया, साथ ही संविधान के अनुच्छेद 16 (4 ए) और (4 बी) के तहत निहित प्रावधानों का पालन भी नहीं हुआ।
Updated on:
18 Apr 2024 11:30 am
Published on:
18 Apr 2024 09:14 am
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