
हाईकोर्ट (Photo source- Patrika)
CG High Court: भूमि अधिग्रहण से जुड़े दो अलग-अलग मामलों में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने लोक निर्माण विभाग (राष्ट्रीय राजमार्ग) को बड़ा झटका दिया है। न्यायालय ने 218 और 219 दिन की देरी से दायर दो मध्यस्थता अपीलों में देरी माफ करने से इनकार करते हुए दोनों अपीलों को निरस्त कर दिया। दोनों मामलों की सुनवाई न्यायमूर्ति बिभु दत्त गुरु द्वारा की गई।
दोनों प्रकरण राष्ट्रीय राजमार्ग अधिनियम, 1956 के तहत राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक 200 (नया 49) के चौड़ीकरण के लिए की गई भूमि अधिग्रहण कार्यवाही से जुड़े हैं। पहले मामले में प्रतिवादी मिनी बाई एवं अन्य, जबकि दूसरे मामले में ग्राम मसनीयाकला, तहसील सक्ती, जिला जांजगीर-चांपा निवासी इटवारी की भूमि का अधिग्रहण किया गया था। 16 अप्रैल 2018 को सक्षम प्राधिकारी द्वारा मुआवजा निर्धारण का अवार्ड पारित किया गया।
मुआवजे से असंतुष्ट होकर संबंधित भूमि स्वामियों ने अधिनियम की धारा 3जी(5) के तहत मुआवजा बढ़ाने के लिए आवेदन प्रस्तुत किया। मध्यस्थ ने 21 फरवरी 2023 को स्वयं मुआवजा पुनर्निर्धारित करने के बजाय प्रकरण को पुन: सक्षम प्राधिकारी को संशोधित/पुनरीक्षित अवार्ड पारित करने के लिए वापस भेज दिया।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट कहा कि, केवल प्रशासनिक और प्रक्रियात्मक कारण पर्याप्त कारण नहीं माने जा सकते। 218 और 219 दिन की लंबी देरी को सामान्य नहीं कहा जा सकता। देरी माफी कोई अधिकार नहीं, बल्कि न्यायालय का विवेकाधीन अधिकार है। मध्यस्थता कानून का उद्देश्य त्वरित निपटारा है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इतनी लंबी देरी केवल असाधारण परिस्थितियों में ही माफ की जा सकती है। न्यायालय ने दोनों मामलों में देरी माफी आवेदन खारिज करते हुए परिणामस्वरूप मध्यस्थता अपीलें भी निरस्त कर दीं।
लोक निर्माण विभाग ने मध्यस्थ के आदेश को मध्यस्थता एवं सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 34 के तहत जिला न्यायालय में चुनौती दी। लेकिन 27 सितंबर 2024 को जिला न्यायालय ने विभाग के आवेदन खारिज कर दिए। इसके बाद विभाग ने धारा 37 के तहत हाईकोर्ट में अपील दायर की, जो क्रमश: 219 और 218 दिन की देरी से प्रस्तुत की गईं। देरी माफ कराने के लिए सीमितीकरण अधिनियम की धारा 5 के तहत आवेदन लगाए गए।
विभाग की ओर से देरी के लिए कई कारण बताए गए, जिसमें आदेश की प्रमाणित प्रति प्राप्त होने के बाद कानूनी राय लेने में समय लगा। फाइल उच्च अधिकारियों की स्वीकृति में लंबित रही। कार्यपालन अभियंता के सेवानिवृत्त होने से पद रिक्त रहा। शीतकालीन अवकाश के कारण विलंब हुआ।
प्रतिवादी पक्ष ने देरी माफी का कड़ा विरोध किया और पूर्व में पारित आदेश (सुमित्रा बाई बनाम कार्यपालन अभियंता, पीडब्ल्यूडी) का हवाला दिया। साथ ही सुप्रीम कोर्ट के निर्णय पर भरोसा जताया गया।
Published on:
19 Feb 2026 12:50 pm
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