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छत्तीसगढ़ की राजनीति में परिवारवाद: 38 सीटों पर वंशवाद का जोर

परिवारवाद का जोर चलता दिखाई दे रहा है कि भाजपा हो या कांग्रेस या फिर हाल में बनी जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़, सभी में कुछ शीर्ष नेता अपने परिवार के लोगों को आगे बढाने में लगे है।

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बिलासपुर. सरगुजा और बिलासपुर संभाग की 38 सीटों पर परिवारवाद का जोर चलता दिखाई दे रहा है कि भाजपा हो या कांग्रेस या फिर हाल में बनी जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़, सभी में कुछ शीर्ष नेता अपने परिवार के लोगों को आगे बढाने में लगे है। कुछ पिता अपने बेटे- बेटियों को आगे बढ़ा चुके हैं, कुछ बढ़ाने के प्रयास में हैं। कुछ पति अपनी पत्नियों को टिकट दिलाने की जुगत में जुटे हैं। बिलासपुर से राजीव द्विवेदी की रिपोर्ट...

अमर अग्रवाल के बाद आयेंगे आदित्य
बिलासपुर जिले की अधिकतर सीटों में परिवारवाद इस कदर हावी है कि नेताओं और विधायकों ने अपने क्षेत्र में या पार्टी के अंदर किसी विकल्प को या तो तैयार नहीं होने दिया या फिर उसका इस कदर विरोध कर रहे हैं कि पार्टी भी किसी और टिकट देने की हिम्मत महीं कर पा रहीं। बिलासपुर में चार बार से विधायक और नगरीय प्रशासन मंत्री अमर अग्रवाल को अपने पिता लखीराम अग्रवाल का फायदा मिला। अब ने अपने बेटे आदित्य को भी आगे करने की तैयारी में हैं। भाजपा में बेलतरा से बद्रीधर दीवान अपने बेटे विजयधर की सियासती जमीन अपने कार्यकाल से ही तैयार कर चुके हैं।

स्व.रामचंद्र सिंहदेव की भतीजी दौड़ में
कोरिया में भी राजमहल का प्रभाव है और यहां से विधायक व मंत्री रह चुके स्व. रामचंद्र सिंहदेव की भतीजी अंबिका सिंहदेव टिकट की दौड़ में सबसे आगे हैं। उनका टिकट पक्का भी माना जा रहा है।

स्व. दिलीप सिंह जूदेव के पुत्र और उनकी बहू की दावेदारीे
जांजगीर-चांपा जिले की चंद्रपर विधानसभा सीट से स्व. दिलीप सिंह जूदेव के सबसे छोटे बेटे युद्धवीर विधायक है जो इस बार भी टिकट की दौड़ में हैं। किसी कारणवश अगर उन्हें टिकट नहीं मिला तो उन्होंने अपनी पत्नी का नाम आगे कर रका है। जिसकी पहल भी क्षेत्र में दिखनी शुरु हो गई है।

बेटे और पत्नी के लिए मांग रहे राकेश सिंह टिकट
वंशवाद की एक और इबारत अकलतरा विधानसभा सीट से इस बार के चुनाव में लिखी जा सकती है। वहां कांग्रेस के पूर्व विधायक राकेश सिंह अपने बेटे राघवेंद्र सिंह व पत्नी सुधा सिंह (किसी एक) के लिए टिकट मांग रहे हैं। टिकट की दौड़ में पूर्व विधायक के बेटे का नाम भी टॉप 3 में चलने की बात कही जा रही है।

जशपुर भी नहीं अछूता
जशपुर से भाजपा के सिटिंग विधायक राजशरण भगत के पिता सुखराम भगत जनता पार्टी से हलधर किसान छाप पर 1978 में जशपुर विधान सभा क्षेत्र से विधायक चुने गए और 1978 से 1980 तक विधायक रहे। जशपुर विधायक राजशरण भगत का यह दूसरा कार्यकाल है इससे पहले वे 2004 से 2008 तक भाजपा से विधायक रह चुके हैं। जिले में और जो विधायक हैं वो किसी राजनीतिक घराने से नहीं हैं। अलबत्ता पत्थलगांव सीट से भाजपा के टिकट के एक दावेदार सालिक साय केन्द्रीय मंत्री विष्णु देव साय के ***** हैं।

रायगढ़ जिले की तीन सीटों पर परिवारवाद
वंशवाद की राजनीति पर गौर करे तो इसमें खरसिया विधानसभा प्रमुख है। खरसिया से लगातार विधायक रहे भाजपा के तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष नंद कुमार पटेल की शहादत के बाद बेटे उमेश पटेल को कांग्रेस प्रत्याशी बनाया गया। हालांकि नंदकुमार की असामयिक मौत की वजह से उनके परिजन को स्वाभाविक दावेदार मानकर टिकट दी गई। मौजूदा समय में भी खरसिया विधानसभा से उन्हें कांग्रेस का टिकट दिया जाना तय है। धरमजयगढ़ में पांच बार के विधायक चनेश राम राठिया के बेटे लालजीत राठिया को पिछली बार टिकट दिया गया है था। वे विधायक है। कांग्रेस की ओर से उन्हें फिर टिकट दिए जाने की प्रबल संभावना है।

लैलूंगा में पति होंगे या पत्नी
आदिवासी के लिए आरक्षित लैलूंगा विधानसभा में वर्ष 2003 में सत्यानंद राठिया भाजपा से विधायक निर्वाचित हुए। वर्ष 2008 के चुनाव में कांग्रेस के हृदय राठिया ने सत्यानंद को हराया। पिछले चुनाव में भाजपा ने सत्यानंद राठिया को टिकट नहीं देते हुए उनकी पत्नी सुनीति राठिया को टिकट दिया। इस बार फिर टिकट का सत्यानंद राठिया व सुनीति राठिया के ईदगिर्द घूम रहा है।

जनता कांग्रेस में जोगी परिवार
जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ के संस्थापक अजीत जोगी ने कांग्रेस में रहते हुए ही अपनी पत्नी और बेटे को टिकट दिलाकर विधायक बनवा लिया था। नई पार्टी बनाने के बाद प्रमुख पदों पर परिवार के तीनों ही सदस्य हैं और अब वे अपनी बहू ऋचा जोगी को भी अकलतरा से चुनाव लड़ाकर राजनीति में स्थापित करने की तैयारी कर रहे हैं।

माता-पिता की विरासत, अब भतीजे की तैयारी
अंबिकापुर विधायक नेता प्रतिपक्ष टीएस सिंहदेव के पिता स्व. एमएस सिंहदेव अविभाजित मध्यप्रदेश के मुख्य सचिव रहने के बाद यहीं योजना आयोग के उपाध्यक्ष बने। उनकी मां देवेंद्र कुमारी सिंहदेव अविभाजित मध्यप्रदेश में सिंचाई मंत्री रहीं। उनके बाद टीएस को विरासत मिली और अब वे अपने भतीजे आदित्य को अंबिकापुर से आगे बढ़ा रहे हैं ताकि उनका विकल्प परिवार से ही रहे।