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टिप्पणीः बोर्ड के नतीजों पर हंसिए मत सरकार, रोइए…- बरुण सखाजी

सीजी बोर्ड के नतीजे कलई खोलते हैं कि हमारे सरकारी स्कूलों की हालत कितनी दयनीय और लचर है। पढ़िए पूरी टिप्पणी

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बरुण सखाजी

राज्य में बोर्ड के नतीजों से खुश होना स्वाभाविक है, लेकिन क्या इस बारे में जरा सोचना नहीं चाहिए कि टॉपर में शामिल कुल 59 बच्चों में से सिर्फ 25 ही सरकारी स्कूलों से आते हैं। इनमें दसवीं के टॉप-10 में शामिल 30 बच्चों में से 14 ही सरकारी स्कूलों से आते हैं। यानी 50 फीसदी भी नहीं, जबकि बारहवीं में हालत और भी खराब है, यहां टॉप-10 के 29 बच्चों में से सिर्फ 7 ही हैं जो सरकारी स्कूलों से आते हैं। वहीं अचरज की बात ये है कि प्रदेश के बड़े शहर रायपुर , बिलासपुर , भिलाई, रायगढ़, कोरबा की बात करें तो यहां से सिर्फ 13 बच्चे दसवीं में और 12 बच्चे बारहवीं की टॉप-10 की सूची में शुमार हैं। पूरी सरकार की नाको तले बसे बड़े शहरों में भी सरकारी शिक्षा खून के आंसू रो रही है।

शिक्षा पर लाख कोशिशों के बाद आखिर राज्य ने क्या पाया? क्या सिर्फ परसेंट के भुलावे में इस बात की अनदेखी की जा सकती है कि सरकारी स्कूलों के हालात दिनोंदिन बिगड़ रहे हैं। दुनियाभर के दावों के बीच सरकारी स्वास्थ्य और शिक्षा में जो पतन का दौर है वह दुखद ही नहीं, विस्फोटक है। शिक्षा से मजाक शिक्षकीय स्टाफ की भर्ती से शुरू होकर अधोसंरचना, कैलेंडराइजेशन, समुचित मॉनीटरिंग की लचर व्यवस्था तक जाता है। नतीजा यह हुआ कि जब कोई यह कहे कि मेरा बच्चा सरकारी स्कूल में पढ़ता है तो हमें यह समझते देर नहीं लगती कि इनका आर्थिक स्तर बहुत अच्छा नहीं। तभी जब कोई कलेक्टर अपने बच्चे को सरकारी स्कूल में पढ़ाता है तो राष्ट्रीय स्तर का समाचार बनता है। आखिर क्यों भई? क्या सरकारी स्कूल पढऩे और पढ़ाने के लिए नहीं। लेकिन जब घने जंगल में भी सांस लेने में ऑक्सीजन की कमी महसूस हो तो समझिए हम दिखावे, भुलावे और भ्रम के घने जंगल में हैं।
शिक्षा को छत्तीसगढ़ प्र्राथमिक मानता ही नहीं। तभी यह विभाग ऐसे हाथों में बेहयाईपूर्वक जारी है, जिनके माथे पर अपनी पत्नी की जगह किसी और को परीक्षा दिलाने का दाग है। इस पर सूबे के मुखिया को भी शर्म नहीं आती। शिक्षा के विभागीय मुखियाओं को तो आएगी ही क्यों? शिक्षा को सरकारों के संगठन अपनी विचारधाराओं के विस्तार के लिए टूल बनाते हैं, लेकिन हालात नहीं सुधारते। कालांतर में जब उच्च शिक्षा में गिरावट आती है तो सर पटककर रोने के अलावा कोई चारा नहीं होता, क्योंकि उन्होंने स्कूल शिक्षा को शिक्षा ही नहीं माना। जिस देश में नालंदा जैसे विश्वविद्यालय रहे हों वहां शिक्षा की ये स्थिति लाख चांद, मंगल , अंतिरक्ष पर धरे कदमों को बेकार साबित करती है। ये वक्त हंसने का है या रोने का, जहां सरकारी स्कूल शिक्षा की कब्रगाह बन रहे हैं। ये तो बच्चों की प्रतिभा है, जो दुश्वारियों के बावजूद अधिकतर सफल हुए। अभी तो बात ऊपर से सिर्फ सरकारी बनाम निजी स्कूलों की की जा रही है, स्कूलों के नतीजों के प्रतिशत देखे जाएंगे तो सरकार आपकी ऐसी नाकामायाबियों का सच खोखले प्रचार के ढिंढोरों के बीच भी चीख उठेगा।