
स्टॉफ नर्स निलंबित (फोटो सोर्स- पत्रिका)
Crime News: बिलासपुर जिला अस्पताल के मातृ-शिशु हॉस्पिटल के प्रसूति वार्ड के दो वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहे हैं, जिसने सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। एक वीडियो में डिलीवरी के बाद प्रसूता के परिजन से "दवा-पानी" और "खुशी" के नाम पर खुलेआम पैसों की मांग की जा रही है।
बताया जा रहा है कि पैसे मांगने वाली स्टॉफ नर्स खुद को मेहनत का हवाला देते हुए एक हजार रुपये लेने की बात कह रही है, जबकि अन्य स्टाफ के लिए 500-500 रुपये अलग से देने की मांग भी की जा रही है। इसके अलावा उसी पीड़ित से एक और जगह पर एडमिशन फॉर्म भरवाने के नाम पर भी पैसे मांगे गए। वह वीडियो भी वायरल हुआ है। इन वीडियो के सोशल मीडिया पर वायरल होते ही स्वास्थ्य महकमें में खलबली मच गई। इस घटना को गंभीरता से लेते हुए संभागीय संयुक्त संचालक डॉक्टर अनिल गुप्ता ने दोनों स्टॉफ नर्स लक्ष्मी वर्मा और संजू चौरसिया को निलंबित कर दिया है।
सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल होते ही हडक़ंप मच गया। जिस आईडी से सबसे पहले वीडियो पोस्ट किया गया था, उसने बाद में इसे डिलीट कर दिया। बताया जा रहा है कि उसी आईडी से एक और वीडियो भी पोस्ट हुआ था, जिसमें एडमिशन फॉर्म भरवाने के नाम पर 100 रुपये मांगे जाने का आरोप था। स्वास्थ्य विभाग द्वारा की गई कार्रवाई में इसका भी उल्लेख है कि फॉर्म भरवाने के नाम पर पैसे मांगे गए थे। जिसमें एक स्टॉफ नर्स पैसे मांगते दिख रही है।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि जिस प्रसूति कक्ष से यह कथित वीडियो जुड़ा बताया जा रहा है, उसके बाहर ही स्पष्ट सूचना पटल लगा है। उसमें लिखा है कि यदि कोई कर्मचारी पैसे मांगे तो आरएमओ या सिविल सर्जन से शिकायत करें। अनाधिकृत रूप से पैसा लेना-देना दंडनीय अपराध है। भुगतान करने पर रसीद अवश्य लें। ऐसे में सवाल उठता है कि जब अस्पताल प्रशासन स्वयं चेतावनी बोर्ड लगा चुका है, तो फिर खुलेआम पैसों की मांग कैसे हो रही है।
यह पहला मामला नहीं है। इससे पहले भी जिला अस्पताल और मातृ-शिशु अस्पताल में डिलीवरी के नाम पर ‘न्योछावर’ की मांग, दुर्व्यवहार और अवैध वसूली के आरोप लग चुके हैं। कई बार शिकायतें भी हुईं, लेकिन स्थायी समाधान अब तक नजर नहीं आया। सूत्रों के मुताबिक जिले के अन्य शासकीय अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों में भी डिलीवरी के बाद पैसे मांगना आम बात बन चुकी है। कई मामलों में पैसे न देने पर दुर्व्यवहार तक की शिकायतें सामने आ चुकी हैं।
एक वीडियो में एक स्टाफ नर्स प्रसूता के पति या किसी अन्य रिश्तेदार (जिसकी पहचान स्पष्ट नहीं) को बुलाकर कहती सुनाई देती है कि "सब अच्छे से हो गया।" युवक धन्यवाद देता है, तो जवाब मिलता है- "धन्यवाद से काम नहीं चलेगा, दवा-पानी और खुशी के नाम पर प्रेम से दे दो, बेटा हुआ है।" इसके बाद नर्स कहती है कि "एक मैं लूंगी और 500 वो लोग लेंगी।" युवक खुद को गरीब बताते हुए 500 रुपये देने की बात करता है, लेकिन महिला 500 रुपये लेने से इनकार करते हुए कहती है- मैं इनके बराबर हूं क्या।
वीडियो में यह भी सुनाई देता है कि युवक कहता है- यह अच्छा नहीं लगता मैडम। जवाब में नर्स कहती है- "एक ग्लब्स तक नहीं मिलता सरकारी अस्पताल में। आप रहने दीजिए फिर, मत दीजिए, हाथ जोड़ रही हूं। अंतत: युवक 1000 रुपये देने की बात कहता है। 500 मैडम का और 500 स्टाफ का। इस दौरान अन्य स्टाफ द्वारा भी और पैसे देने का दबाव बनाए जाने की आवाजें सुनाई देती हैं। इस गंभीर मुद्दे पर जिला अस्पताल के सिविल सर्जन डॉ. अनिल गुप्ता से प्रतिक्रिया लेने के लिए कई बार कोशिश की गई, लेकिन उन्होंने कॉल रिसीव नहीं किया।
प्रसूति वार्ड के बाहर साफ लिखा है कि पैसे मांगना दंडनीय अपराध है, फिर भी ‘न्योछावर’ और ‘दवा-पानी’ के नाम पर वसूली कैसे हो रही थी?
मामला संज्ञान में आते ही हमने तत्काल जांच कराई और प्रथम दृष्टया दोषी पाए गए दो स्टाफ नर्सों को निलंबित कर दिया गया है। अस्पतालों में किसी भी प्रकार की अवैध वसूली कतई बर्दाश्त नहीं की जाएगी। स्पष्ट निर्देश हैं कि मरीजों से किसी भी बहाने राशि मांगना पूर्णत: प्रतिबंधित है।
क्या सिर्फ दो नर्सों का निलंबन पर्याप्त है, या पूरी कार्यप्रणाली और अन्य कर्मचारियों की भूमिका की भी जांच होगी?
प्रारंभिक कार्रवाई के बाद विस्तृत जांच जारी है। प्रभारी जेडी स्वयं इस प्रकरण की मॉनिटरिंग कर रहे हैं। यदि जांच में अन्य किसी कर्मचारी या स्तर की संलिप्तता सामने आती है तो उनके खिलाफ भी नियमानुसार कठोर कदम उठाए जाएंगे।
यदि अस्पताल में ‘एक ग्लव्स तक नहीं है’ जैसी स्थिति बताई जा रही है, तो क्या यह व्यवस्था की विफलता नहीं है? जिम्मेदारी किसकी होगी?
सामग्री और संसाधनों की उपलब्धता संबंधी प्रश्नों पर सिविल सर्जन ही अधिकृत रूप से जानकारी दे सकते हैं। फिर भी, यदि कहीं कमी पाई जाती है तो उसकी समीक्षा कर आवश्यक सुधारात्मक कदम उठाए जाएंगे ताकि मरीजों को किसी प्रकार की असुविधा न हो।
क्या कार्रवाई केवल वीडियो वायरल होने के बाद होती है, या भविष्य में बिना सोशल मीडिया दबाव के भी पीडि़तों को न्याय मिलेगा?
विभाग का प्रयास रहेगा कि शिकायतों पर त्वरित और निष्पक्ष कार्रवाई हो, चाहे मामला सार्वजनिक हो या न हो। भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए निगरानी व्यवस्था को और सख्त किया जाएगा तथा शिकायत तंत्र को मजबूत बनाया जाएगा।
सरकारी अस्पतालों में गरीब और निम्न आय वर्ग के लोग पहुंचते हैं। ऐसे में डिलीवरी जैसी संवेदनशील स्थिति में परिजनों पर खुशी और प्रेम के नाम पर आर्थिक दबाव बनाना न केवल अनैतिक है, बल्कि कानूनन अपराध भी है। वीडियो वायरल होने के बाद कई अन्य पीडि़तों ने भी कमेंट्स के जरिए व्यथा बताई। लिखा कि, उनसे सफाई, डिलीवरी व सेवा के नाम पर 1 हजार से 5 हजार तक लिए गए। शासकीय अस्पतालों में की जाने वाली वसूली के वीडियो के वायरल होने पर लोग अपने गुस्से को कमेंट्स के रूप में साझा कर रहे हैं।
Published on:
26 Feb 2026 11:08 am
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