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करिया मंदिर की अद्भुत गाथा: नागों की निशानी, सुरंग का रहस्य और काले पत्थर पर बसी अपार श्रद्धा… जानें इसकी मान्यता

Kaleshwar Mahadev Temple: बिलासपुर से लगभग 10 किलोमीटर दूर भरनी गांव में स्थित कालेश्वर महादेव मंदिर श्रद्धा, रहस्य और मान्यताओं का केंद्र है।

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कालेश्वर महादेव मंदिर (फोटो सोर्स-पत्रिका)

कालेश्वर महादेव मंदिर (फोटो सोर्स-पत्रिका)

Kaleshwar Mahadev Temple: बिलासपुर से लगभग 10 किलोमीटर दूर भरनी गांव में स्थित कालेश्वर महादेव मंदिर श्रद्धा, रहस्य और मान्यताओं का केंद्र है। 500 वर्ष से अधिक पुराने इस मंदिर में स्थापित शिवलिंग काले पत्थर से निर्मित है, जिसे करिया मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। यह स्थान विशेष रूप से नि:संतान दंपत्तियों के लिए आस्था का केंद्र है, जो संतान सुख की कामना लेकर यहां पहुंचते हैं।

नाग-नागिन की कथा व चमत्कारी जल स्रोत

लोगों की मान्यता है कि एक समय मंदिर परिसर में नाग-नागिन का जोड़ा देखा गया था। कहा जाता है कि उस जोड़े के मारे जाने के बाद मंदिर के पास बने सरोवर का जल लाल हो गया था। तभी से इस स्थान की ख्याति बढ़ गई और यहां नियमित रूप से शिव की पूजा होने लगी।

सावन सोमवार को जल अर्पित करने दूर-दूर से आते हैं कांवड़िए

सावन मास में हर सोमवार को मंदिर में शिवजी का विशेष श्रृंगार और आरती की जाती है। बेलपान स्थित छोटी नर्मदा नदी से कांवड़ यात्रा के जरिए भक्त जल लाकर शिवलिंग पर चढ़ाते हैं। मान्यता है कि इस जल से अभिषेक करने पर शिव भक्तों की मनचाही इच्छाएं पूरी होती हैं। इसके साथ ही मंदिर में महाशिवरात्रि पर एक दिवसीय मेला लगता है, जिसमें दूर-दूर से श्रद्धालु आते हैं। नवरात्रि के दौरान यहां माता पार्वती की विशेष पूजा होती है।

रहस्यमयी इतिहास, काले पत्थर से जुड़ी लोकगाथा

ग्रामीणों की मान्यता है कि इस मंदिर का निर्माण अर्धरात्रि में हुआ था। प्रारंभ में यह घने जंगलों के बीच स्थित था, जिससे यहां लोग आने-जाने से हिचकते थे। धीरे-धीरे मंदिर की बाहरी दीवारें काली पड़ने लगीं और इसका नाम करिया मंदिर पड़ गया। आज भी यह नाम आस्था के साथ जुड़ा हुआ है। माना जाता है कि यहां भोलेनाथ की पूजा से मनोकामनाएं अवश्य पूर्ण होती हैं।

तीन पीढ़ियों से लगातार सेवा कर रहा है एक परिवार

मंदिर की देखरेख और पूजा-अर्चना की जिमेदारी पिछले तीन पीढ़ियों से अवस्थी परिवार निभा रहा है। वर्तमान में मंदिर के पुजारी पं. उत्तम अवस्थी हैं। उन्होंने बताया कि उनके दादा, स्व. पं. दीनदयाल अवस्थी ने सबसे पहले इस मंदिर में सेवा शुरू की थी। मंदिर के गर्भगृह में एक रहस्यमयी सुरंग है, जिसके जल स्तर में कभी वृद्धि नहीं होती। यह बात आज भी लोगों को चमत्कार लगती है।

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