
बिलासपुर. वैसे तो हर एक व्यक्ति प्रभु का सुमिरन कर जीवन में सुख-शांति की कामना करता है। कोई उनसे नौकरी मांगता है तो कोई मनचाहा वरदान। प्रभु का नाम जपने से स्वर्ग मिलता है, यह बात तो हर कोई जानता है। लेकिन शहर में एक वर्ग एेसा है जिनका पेशा ही है भगवान के नाम पर मांगकर जीवन-यापन करना। हम बात कर रहे भिक्षुओं की, जो शहर में हर क्षेत्र में मिल जाते हैं। ये लोग पूरे दिन भगवान के नाम पर ही भिक्षा मांगते है और अपना पेट पालते है। इनका पेशा ही भिक्षावृत्ति है एेसे लोग कई कारण से भिक्षावृत्ति करते हैं। समय बहुत बदल गया हैं, लेकिन एेसे लोगों की संख्या भी बढ़ रही है। इनकी तो दिवाली दूसरों के दान पर ही निर्भर होती है। मिल गया तो अच्छा और न मिला तो दूसरों को देखकर ही खुशी मना लेते हैं। आखिर यह किसकी दिवाली है, जहां पर समाज का यह वर्ग एेसा है, जिसे पता ही नहीं कि उसे दिनभर में खाना मिलेगा या नहीं। शहर के ज्यादातर मंदिरों के पास भिक्षुओं की संख्या देखने को मिलती है। कोई बुजुर्ग, तो कोई नि:शक्त, कोई देख नहीं पाता तो कोई एेसा भी है जो मजदूरी नहीं कर पाता। ये लोग टोलियों में पूरा दिन शहर में घूम-घूम कर भिक्षा मांगते हैं। इनका जीवन बस दूसरों की कृपा पर ही निर्भर होता है। दिवाली, दशहरा, होली हर त्योहार में इनकी टोली भिक्षा मांगकर पेट भरती है।
मंदिरों के पास बैठे भिक्षुओं को त्योहार में मंदिर का प्रसाद मिल जाता है और कुछ लोग जो भगवान से मन्नत मांगें, वह पूरा होने पर खुशी से दान करते हैं। भिक्षु कोंदी ने बताया कि उनका पूरा जीवन भिक्षा मांगकर ही चल रहा है। फटे-पुराने कपड़े पहनकर गुजारा करते हैं। जो मिल जाता है खा लेते हैं। इसी तरह से जीवन चल रहा है।
दूसरों का है सहारा : भिक्षुक महिला कहती है, हम तो जन्म से ही भिक्षा मांग रहे हैं तो हमारा जीवन तो भिक्षा मांग कर ही गुज रहा है। दिवाली में कोई न कोई दीया व बाती देते है तो मिठाई भी देकर चला जाता है। तो हम लोग त्योहार मना लेते है। उनको दुआ देकर दिवाली हो या अन्य त्योहार मनाते हैं।
Published on:
18 Oct 2017 11:32 am
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