
फर्जी सर्पदंश मुआवजा घोटाले की जांच (photo source- Patrika)
Snakebite Compensation Scam: छत्तीसगढ़ के चर्चित सर्पदंश मुआवजा घोटाले की जांच अब विशेषज्ञ एजेंसी को सौंपी जा सकती है। बिलासपुर पहुंचे पुलिस महानिदेशक (DGP) अरुण देव गौतम ने कहा कि मामला गंभीर है और आर्थिक अनियमितताओं की जांच के लिए विशेषज्ञ एजेंसी से जांच कराने का प्रस्ताव भेजा गया है। उनके बयान के बाद इस मामले की जांच EOW (आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो) को सौंपे जाने की संभावना बढ़ गई है। DGP ने अब तक की पुलिस कार्रवाई को लेकर भी संतोष जताया। उन्होंने कहा कि पुलिस ने मामले की जांच ईमानदारी और पारदर्शिता के साथ की है। अब आर्थिक गड़बड़ियों से जुड़े पहलुओं की विस्तृत जांच के लिए विशेषज्ञ एजेंसी की मदद ली जाएगी।
सर्पदंश से मौत होने पर सरकार की ओर से मृतक के परिवार को 4 लाख रुपए की आर्थिक सहायता देने का प्रावधान है। आरोप है कि इसी योजना का फायदा उठाने के लिए एक संगठित गिरोह ने फर्जी दस्तावेज तैयार किए और सामान्य मौतों को भी सर्पदंश से हुई मौत बताकर मुआवजा हासिल किया।
मामले में जशपुर और बिलासपुर के आंकड़ों को लेकर भी सवाल उठे हैं। जशपुर में पिछले तीन वर्षों के दौरान सर्पदंश से 96 मौतें दर्ज की गईं, जबकि बिलासपुर में 431 मौतें दिखाकर करीब 17 करोड़ 24 लाख रुपए का मुआवजा बांटे जाने की बात सामने आई है। बेलतरा विधायक सुशांत शुक्ला ने विधानसभा में इस मामले को उठाया था। इसके बाद मामला चर्चा में आया और राजस्व मंत्री टंकराम वर्मा ने उच्चस्तरीय जांच कर दोषियों के खिलाफ कार्रवाई का भरोसा दिया था।
जांच में आरोप है कि घोटाले में शामिल लोगों ने सामान्य परिस्थितियों में हुई मौतों को सर्पदंश से हुई मौत के रूप में दर्ज कराया। इसके लिए कथित तौर पर फर्जी दस्तावेज और रिकॉर्ड तैयार किए गए। कुछ मामलों में मृतकों के परिजनों को जानकारी दिए बिना ही मुआवजे की राशि निकालने का भी आरोप है। बाद में इस रकम को कथित तौर पर आरोपियों के बीच बांट दिया जाता था।
मामले की जांच में अब तक 17 लोगों की गिरफ्तारी हो चुकी है। इनमें डॉक्टर, पुलिसकर्मी और तहसील से जुड़े कर्मचारी भी शामिल बताए जा रहे हैं। जांच एजेंसियों के अनुसार, कथित तौर पर ‘एडवोकेट डायमंड गैंग’ के जरिए पूरे खेल को अंजाम दिया जाता था। आरोप है कि इस नेटवर्क में पुलिस, स्वास्थ्य और राजस्व विभाग से जुड़े कुछ अधिकारी-कर्मचारियों की भूमिका भी सामने आई है।
जांच में सामने आए आरोपों के मुताबिक, अस्पताल में किसी व्यक्ति की मौत की जानकारी मिलते ही गिरोह सक्रिय हो जाता था। इसके बाद मौत को सर्पदंश से जोड़कर फर्जी केस तैयार किया जाता था। बताया गया है कि मुआवजा दिलाने के नाम पर करीब 1.5 लाख रुपए तक की सेटिंग की जाती थी। इसके बाद सरकारी योजना के तहत मिलने वाली राशि को हासिल करने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाती थी। अब EOW या किसी अन्य विशेषज्ञ एजेंसी को जांच सौंपे जाने के बाद इस कथित नेटवर्क में शामिल लोगों, पैसों के लेन-देन और सरकारी रिकॉर्ड में हुई गड़बड़ियों की भी विस्तृत पड़ताल हो सकती है।
Updated on:
13 Aug 2026, 1:02 PM IST
Published on:
13 Aug 2026, 1:02 PM IST
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