
बॉलीवुड के महान गीतकार आनंद बख्शी का नाम आज भी लोगों के दिलों में बसा हुआ है। उन्होंने अपने जीवन में जो गाने लिखे, वे आज भी सदाबहार बने हुए हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि आनंद बख्शी कभी गीतकार नहीं बनना चाहते थे? उनका सपना था गायक बनने का, लेकिन किस्मत ने उन्हें शब्दों के जादूगर के रूप में बॉलीवुड को दिया।
आनंद बख्शी का जन्म 21 जुलाई, 1930 को रावलपिंडी (अब पाकिस्तान) में एक मोहयल ब्राह्मण परिवार में हुआ था। मात्र पांच साल की उम्र में उनकी मां का निधन हो गया। विभाजन के समय उनका परिवार भारत आ गया और दिल्ली में बस गया। 14 वर्ष की उम्र में उन्होंने ‘रॉयल इंडियन नेवी’ में कराची में सेवा की, लेकिन नेवी से बाहर निकाल दिए जाने के बाद उन्होंने आर्मी में भर्ती ले ली। 1950 में, उन्होंने गायक और गीतकार बनने का सपना लिए मुंबई की ओर रुख किया।
मुंबई पहुंचने के बाद आनंद बख्शी की मुलाकात अभिनेता भगवान दादा से हुई, जिन्होंने उन्हें अपनी फिल्म 'भला आदमी' में गीत लिखने का मौका दिया। हालांकि, इस फिल्म से उन्हें कोई खास पहचान नहीं मिली, लेकिन यह बॉलीवुड में उनकी एंट्री का पहला कदम साबित हुआ।
साल 1963 में, राज कपूर ने अपनी फिल्म 'मेहंदी लगी मेरे हाथ' में आनंद बख्शी को गाने का मौका दिया। लेकिन उनकी असली पहचान साल 1965 में आई फिल्म 'जब जब फूल खिले' के गाने 'परदेसियों से न अखियां मिलाना' और 'ये समा, समा है ये प्यार का' से मिली। इन गानों ने आनंद बख्शी को म्यूजिक लवर्स के दिलों पर राज करने वाला गीतकार बना दिया।
आनंद बख्शी को अपने करियर में 40 फिल्मफेयर नॉमिनेशंस मिले, जिनमें से केवल चार बार ही उन्हें अवॉर्ड मिला। उन्होंने कई मशहूर संगीतकारों के साथ काम किया, लेकिन आर.डी. बर्मन के साथ उनकी जोड़ी खासतौर पर सफल रही। दोनों ने मिलकर 'महबूबा महबूबा', 'सावन का महीना', 'ओम शांति ओम', और 'ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे' जैसे कई सुपरहिट गाने दिए।
आनंद बख्शी अपने आखिरी दिनों में दिल की बीमारी से जूझ रहे थे। 30 मार्च 2002 को उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। उनकी स्मोकिंग की आदत उनकी मृत्यु का एक बड़ा कारण बनी। अपने पीछे उन्होंने अनगिनत बेहतरीन गाने छोड़े, जिनके जरिए वह आज भी फैंस के दिलों में जिंदा हैं।
Published on:
20 Jul 2024 06:40 pm
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