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हमारी आत्मा क्लासिकल म्यूजिक है, लेकिन गाने फिल्मी गाते हैं – आशा भोसले

Raymond MTV India Music Summit 2019 : आशा भोसले ( Asha Bhosle ) ने रीक्रिएशन और रीमिक्स इस दौर पर अपनी बात रखते हुए कहा कि असल तो असल होता है, बाकी तो सब यूं ही चलता रहता है। असल सिंगर उसी आवाज में उसे बैटर करने के लिए उसका गाना गाए, तो बेहतर है, बाकी तो तोडमरोड कर आॅरिजनल को खराब कर देते है।

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Pawan Kumar Rana

Oct 04, 2019

हमारी आत्मा क्लासिकल म्यूजिक है, लेकिन गाने फिल्मी गाते हैं - आशा भोसले

हमारी आत्मा क्लासिकल म्यूजिक है, लेकिन गाने फिल्मी गाते हैं - आशा भोसले

जयपुर। रेमंड एमटीवी इंडिया म्यूजिक समिट ( Raymond MTV India Music Summit 2019 ) में शिरकत करने आई सिंगर आशा भोसले ( Asha Bhosle) गीतकार प्रसून जोशी ( Prasoon Joshi ) के साथ रूबरू हुई। उन्होंने कहा कि इस समिट तक सिर्फ म्यूजिक ही खींचकर लाया है। वैसे मैं जो कमिट कर देती हूं, उसे निभाती जरूर हूं। प्रसून की तरफ इशारा करते हुए आशा ने कहा कि ये लोग क्लासिकल म्यूजिक को बढ़ावा देने और सबके कान तैयार करने यानी नए श्रोता बनाने का काम कर रहा है।

इंडिया म्यूजिक समिट जैसे आयोजन हर जगह होने चाहिए, आज जो म्यूजिक का हाल है, उसे म्यूजिक नहीं कहा जा सकता है। म्यूजिक के नाम पर सबकुछ चल रहा है, म्यूजिक असल में क्या है किसी ने समझा ही नहीं है। जो समझते है वो इसे फिर से जोड़ने का काम कर रहे हैं। इस कोशिश में मेरा भी योगदान रहेगा, क्योंकि मैं क्लासिकल घराने से ही ताल्लुक रखती हूं। मेरे पिताजी ग्वालियर घराने से सीखे हुए थे। उन्होंने हम सभी बहनों को बचपन से क्लासिकल की शिक्षा दी है। हमारी आत्मा क्लासिकल म्यूजिक है, लेकिन हम गाने फिल्म लाइन के गाते हैं, क्योंकि अब यह हमारा प्रोफेशन बन गया है। जैसे प्रसून फिल्मों के लिए गीत लिखते हैं, वैसे ही हम फिल्मों के लिए गीत गाते हैं। गौरतलब है कि शनिवार को प्रसून जोशी के सारथ आशा भोसले सेशन 'इन आंखो की मस्ती के' में रूबरू होंगी।

क्लासिकल म्यूजिक बीज है
प्रसून के सवाल पर आशा ने कहा कि जैसे बीज से पौधा और फिर पेड़ बनता है, वैसे ही क्लासिकल म्यूजिक भी असल म्यूजिक का बीज है। क्लासिकल का ही बेस होने पर हम गा सकते हैं। आजकल आप देख रहे हैं कि पुराने लोग जो क्लासिकल सीखे हुए थे और जो आज कॉलेज से निकले हुए गा रहे है, जो सुनकर गा रहे है। आज आवाजेें तो है, कोशिशें भी हैं, लेकिन वो बात नहीं निकलती है। जो किशोर कुमार, लता मंगेश्कर, रफी, मुकेश मन्ना डे की बात थी, ऐसे में क्लासिकल बेस होना जरूरी है।

गजल के लिए उर्दू की जगह हिन्दी को आसान बनाना होगा
गजल को फिर से लोकप्रिय बनाने के सवाल पर आशा ने कहा कि गजल गाने के लिए हिन्दी और उर्दू भाषा का ज्ञान होना जरूरी है, लेकिन आज उर्दू गायब हो गई है। ऐसे में उर्दू की जगह हिन्दी को ही आसान भाषा में लेकर गजल लिखनी होगी। ताकि लोग गजल को समझ पाएं। गाने में पहली बात आवाज होती है, जो ईश्वर से मिलती है, इसे पक्का करना इंसान की कोशिश होती है। सबसे महत्वपूर्ण होती है भावना, ऐसे में गीत को भावना के साथ गाना बेहद जरूरी होता है।

असल-असल होता है, बाकी सब चलता है
आशा ने रीक्रिएशन और रीमिक्स के इस दौर पर अपनी बात रखते हुए कहा कि असल तो असल होता है, बाकी तो सब यूं ही चलता रहता है। असल सिंगर उसी आवाज में उसे बैटर करने के लिए उसका गाना गाए, तो बेहतर है। बाकी तो तोड़मरोड़ कर आॅरिजनल को खराब कर देते हैं। ऐसे में नए कलाकार की यह कोशिश होनी चाहिए कि वे अपने आॅरिजनल क्रिएशन पर ध्यान दे, पुराने लोगों के क्रिएशन पाठशाला की तरह है, बच्चों को सीखना चाहिए।