कभी रेडियो केे लिए जिंगल बनाते थे ए. आर. रहमान, दुख और संघर्ष से लेकर ऑस्कर तक की कहानी

By: Mahendra Yadav
| Published: 06 Jan 2020, 10:56 AM IST
कभी रेडियो केे लिए जिंगल बनाते थे ए. आर. रहमान, दुख और संघर्ष से लेकर ऑस्कर तक की कहानी
A R rahman

उनका मूल नाम ए.एस. दिलीप कुमार था जो बाद में उन्होंने 1986 में इस्लाम कबूल करने के बाद अल्लाह रखा रहमान रख लिया।

संगीतकार और म्यूजिक डायरेक्टर ए.आर.रहमान को एक ऐसे प्रयोगवादी और प्रतिभाशाली संगीतकार के रूप में शुमार किया जाता है, जिन्होंने भारतीय सिनेमा के संगीत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विशेष पहचान दिलाई है। 6 जनवरी, 1967 को तमिलनाडु में जन्मे रहमान का रूझान बचपन के दिनो से ही संगीत की ओर था। उनका मूल नाम ए.एस. दिलीप कुमार था जो बाद में उन्होंने 1986 में इस्लाम कबूल करने के बाद अल्लाह रखा रहमान रख लिया। उनके पिता आर.के.शेखर मलयालम फिल्मों के लिए संगीत दिया करते थे। संगीत के प्रति बेटे के बढ़ते रूझान को देख पिता ही उन्हें संगीत की शिक्षा देने लगे। 6 साल की उम्र में ही सिंथेसाइजर और हारमोनियम पर रियाज के दौरान 'की बोर्ड' पर उनकी उंगलियां ऐसा कमाल करती थीं कि सुनने वाले स्तब्ध रह जाते थे।


पिता के दोस्त ने ली परीक्षा
एक बार उनके घर में पिता के एक मित्र आए और जब उन्होंने रहमान की बनाई धुन सुनी तो उन्हें विश्वास नहीं हुआ। परीक्षा लेने के लिए उन्होंने हारमोनियम पर कपडा रख दिया और धुन निकालने के लिए कहा। हारमोनियम पर रखे कपड़े के बावजूद रहमान की उंगलियां बोर्ड पर थिरक उठी और उस धुन को सुन वह चकित रह गए। रहमान अभी संगीत सीख ही रहे थे तो उनके सर से पिता का साया उठ गया लेकिन रहमान ने हिम्मत नहीं हारी और संगीत का रियाज सीखना जारी रखा।

कभी रेडियो केे लिए जिंगल बनाते थे ए. आर. रहमान, दुख और संघर्ष से लेकर ऑस्कर तक की कहानी

इल्लय राजा के लिए बजाते थे की बोर्ड

उन्होंने मास्टर धनराज से संगीत की शिक्षा हासिल की और दक्षिण फिल्मों के प्रसिद्ध संगीतकार इल्लय राजा के ग्रुप के लिए की बोर्ड बजाना शुरू कर दिया। उस समय रहमान की उम्र महज 11 वर्ष थी। इस दौरान उन्होंने कई नामी संगीतकारों के साथ काम किया। इसके बाद उन्हें लंदन के ट्रिनिटी कॉलेज ऑफ म्यूजिक में स्कॉलरशिप मिला और यहां से उन्होंने वेस्टर्न क्लासिकल म्यूजिक की स्नातक की डिग्री भी हासिल की। स्नातक की डिग्री लेने के बाद वे वापस आ गए और घर में हीं एक म्यूजिक स्टूडियो खोला और उसका नाम 'पंचाथम' रिकार्ड इन रखा।

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रेडियो जिंगल बनाते थे
रहमान ने लगभग एक साल तक फिल्म इंडस्ट्री में अपनी पहचान बनाने के लिए संघर्ष किया। इस दौरान वे टीवी के लिए छोटा-मोटा संगीत देने और रेडियो जिंगल बनाने का काम करते रहे। वर्ष 1992 रहमान के सिने कॅरियर का महत्वपूर्ण वर्ष साबित हुआ। अचानक उनकी मुलाकात फिल्म निर्देशक मणि रत्नम से हुई। मणि उन दिनों फिल्म रोजा के निर्माण में व्यस्त थे और अपनी फिल्म के लिए संगीतकार की तलाश में थे। उन्होंने रहमान को अपनी फिल्म में संगीत देने की पेशकश की। इस फिल्म में सुपरहिट संगीत से उन्होंने श्रोताओं का दिल जीत लिया और सर्वश्रेष्ठ संगीतकार के राष्ट्रीय पुरस्कार से भी सम्मानित किये गए। इसके बाद रहमान ने पीछे मुड़कर कभी नहीं देखा।

अवॉर्ड
ए.आर. रहमान को बतौर संगीतकार अब तक 15 बार फिल्म फेयर पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है। साथ ही उत्कृठ संगीत के लिए छह बार राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उन्हें पद्यश्री से भी नवाजा जा चुका है। उन्होंने फिल्म स्लमडॉग मिलिनेयर के लिए दो ऑस्कर पुरस्कार जीतकर नया इतिहास रच दिया। रहमान को 81वें एकादमी अवार्ड समारोह में इस पुरस्कार से सम्मानित किया गया। वे आज भी उसी जोशो खरोश के साथ संगीत जगत को अपने जादुई संगीत से सुशोभित कर रहे है।

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