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मोहम्मद रफी: एक फकीर की वजह से बने मशहूर सिंगर

उन्होंने गुलाम अली खां से भारतीय शास्त्रीय संगीत भी सीखना शुरू कर दिया

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Mahendra Yadav

Jul 31, 2018

Mohammad rafi

Mohammad rafi

आवाज की दुनिया के बेताज बादशाह मोहम्मद रफी को प्लेबैक सिंगिंग की प्रेरणा एक फकीर से मिली थी। पंजाब के कोटला सुल्तान सिंह गांव मे 24 दिसंबर 1924 को एक मध्यम वर्गीय मुस्लिम परिवार में जन्में रफी एक फकीर के गीतों को सुना करते थे। जिससे उनके दिल में संगीत के प्रति एक अटूट लगाव पैदा हो गया। रफी के बड़े भाई हमीद ने मोहम्मद रफी के मन में संगीत के प्रति बढ़ते रूझान को पहचान लिया था और उन्हें इस राह पर आगे बढऩे मे प्रेरित किया।

गुलाम अली से ली शास्त्रीय संगीत की प्रेरणा:
लाहौर में रफी संगीत की शिक्षा उस्ताद अब्दुल वाहिद खान से लेने लगे और साथ ही उन्होंने गुलाम अली खां से भारतीय शास्त्रीय संगीत भी सीखना शुरू कर दिया। एक बार हमीद,रफी को लेकर के.एल.सहगल के संगीत कार्यक्रम में गए लेकिन बिजली नहीं रहने के कारण के.एल.सहगल ने गाने से इंकार कर दिया।

13 की उम्र में गाया पहला गाना:
हमीद ने कार्यक्रम के संचालक से गुजारिश की वह उनके भाई रफी को गाने का मौका दें। संचालक के राजी होने पर रफी ने पहली बार 13 वर्ष की उम्र मे अपना पहला गीत स्टेज पर दर्शकों के बीच पेश किया। दर्शकों के बीच बैठे संगीतकार श्याम सुंदर को उनका गाना अच्छा लगा और उन्होनें रफी को मुंबई आने के लिए न्यौता दिया। श्याम सुदंर के संगीत निर्देशन में रफी ने अपना पहला गाना 'सोनिये नी हिरीये नी..' जीनत बेगम के साथ एक पंजाबी फिल्म 'गुल बलोच'के लिए गाया।

गाए 26000 से भी ज्यादा गाने:
वर्ष 1944 मे नौशाद के संगीत निर्देशन में उन्हें अपना पहला हिन्दी गाना हिन्दुस्तान के हम है ..पहले आप ..के लिये गाया । वर्ष 1949 मे नौशाद के संगीत निर्देशन मे दुलारी फिल्म मे गाये गीत 'सुहानी रात ढ़ल चुकी' के जरिए वह सफलता के शिखर पर पहुंच गए और इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। दिलीप कुमार देवानंद, शम्मी कपूर, राजेन्द्र कुमार, शशि कपूर, राजकुमार जैसे नामचीन नायकों की आवाज कहे जाने वाले रफी अपने संपूर्ण सिने कॅरियर में लगभग 700 फिल्मों के लिये 26000 से भी ज्यादा गीत गाये।