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ओटीटी प्लेटफॉर्म पर आई ‘एक थी बेगम’, जुर्म अनंत, जुर्म कथा अनंता

अस्सी के दशक की पृष्ठभूमि वाली इस वेब सीरीज की नायिका अशरफ उर्फ सपना (अनुजा सेठी) अपने पति की हत्या का बदला लेने के लिए जुर्म की दुनिया में दाखिला लेती है।

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ओटीटी प्लेटफॉर्म पर आई 'एक थी बेगम', जुर्म अनंत, जुर्म कथा अनंता

ओटीटी प्लेटफॉर्म पर आई 'एक थी बेगम', जुर्म अनंत, जुर्म कथा अनंता

-दिनेश ठाकुर
समाज शास्त्री भले जुर्म और मुजरिमों के महिमा मंडन के खिलाफ आवाज बुलंद करते रहें, फिल्म वालों के लिए जुर्म की दुनिया फार्मूलों की ऐसी भरी-पूरी खान है कि खुदाई करते जाओ और फिल्में बनाते जाओ। मारिओ पुजो के उपन्यास 'द गॉडफादर' पर हॉलीवुड में 1972 में इसी नाम से बनी फिल्म से यह सिलसिला शुरू हुआ था। तब से अब तक हॉलीवुड और बॉलीवुड में जुर्म के दलदल पर जाने कितनी फिल्में बन चुकी हैं।

कुछ साल पहले तक रामगोपाल वर्मा का फिल्मी कारखाना तो एक के बाद एक इसी तरह की फिल्मों का उत्पादन कर रहा था। ओटीटी प्लेटफॉर्म एमएक्स प्लेयर पर इन दिनों दिखाई जा रही 'एक थी बेगम' नाम की वेब सीरीज रामगोपाल वर्मा की उन्हीं फिल्मों की याद दिलाती है। अस्सी के दशक की पृष्ठभूमि वाली इस वेब सीरीज की नायिका अशरफ उर्फ सपना (अनुजा सेठी) अपने पति की हत्या का बदला लेने के लिए जुर्म की दुनिया में दाखिला लेती है और एक बड़े माफिया डॉन (अजय गेही) के नाक में दम कर देती है।

नौ साल पहले आई एस. हुसैन जैदी की किताब 'माफिया क्वीन्स ऑफ मुम्बई' में जिन महिला डॉन के किस्से थे, यह वेब सीरीज उनमें से एक किरदार से प्रेरित है। अपराध को आध्यात्म से 'ज्यादा रसीला' और बंदूक को गुलाब से 'ज्यादा आकर्षक' मानने वाले फिल्मकार विशाल भारद्वाज (मकबूल, ओमकारा, कमीने) की नजर भी अशरफ उर्फ सपना नाम के इस किरदार पर थी। कुछ साल पहले उन्होंने दीपिका पादुकोण और इरफान खान को लेकर इस पर 'सपना दीदी' बनाने का ऐलान किया था, लेकिन इससे पहले कि इस फिल्म की शूटिंग शुरू होती, इरफान को कैंसर के इलाज के लिए लंदन जाना पड़ा। तभी से 'सपना दीदी' अधर में है।

'माफिया क्वीन्स ऑफ मुम्बई' के एक दूसरे किरदार पर संजय लीला भंसाली की 'गंगूबाई काठियावाड़ी' आधी से ज्यादा बन चुकी है। इसमें फंतासी कथा की राजकुमारी सिंड्रेला जैसी मासूम आलिया भट्ट पहली बार महिला डॉन के किरदार में नजर आएंगी। फिल्म में गुजरात के खाते-पीते परिवार की युवती गंगा हरजीवनदास के प्रेमी के साथ भागकर मुम्बई पहुंचने, शादी के बाद 500 रुपए में कोठे पर बेचे जाने, डॉन करीमलाला के सम्पर्क में आने और ताकतवर गंगूबाई काठियावाड़ी के तौर पर उभरने का किस्सा होगा। इससे पहले भी महिला डॉन किरदारों पर कई फिल्में बन चुकी हैं।

इनमें शबाना आजमी की 'गॉडमदर' इस मामले में उल्लेखनीय है कि यह आम फामूलों से बचते हुए उन कारणों को टटोलती है, जिनको लेकर जुर्म की दुनिया में कुछ चेहरे ताकत के साथ उभरते हैं। यह गुजरात की डॉन संतोकबेन जडेजा की जिंदगी पर आधारित थी। बहरहाल, 'माफिया क्वीन्स ऑफ मुम्बई' के कुछ और किरदारों पर कुछ और फिल्मकारों की नजरे-इनायत हो जाए तो हैरानी नहीं होनी चाहिए। बॉलीवुड की आबो-हवा ही कुछ ऐसी है कि पुरुष डॉन हों या महिला डॉन, दोनों के लिए 'मेरा दर खुला है, खुला ही रहेगा तुम्हारे लिए' का भाव रहता है। मुजफ्फर अली कई साल पहले प्राचीन कश्मीरी शायरा हब्बा खातून पर डिम्पल कपाडिया को लेकर 'जूनी' बनाना शुरू करते हैं और कुछ रीलों बाद फिल्म अटक जाती है। माफिया पर बनने वाली फिल्में इस तरह नहीं अटकतीं। कारोबारी मैदान में इन्हीं फिल्मों पर ज्यादा दाव लगाए जाते हैं.. जाने कौन-सी फिल्म लम्बी रेस का घोड़ा साबित हो जाए।