
prasoon joshi
राजस्थान पत्रिका के पेट्र्रर्न में शुक्रवार 4 अक्टूबर से तीन दिवसीय संगीत का महाकुंभ एमटीवी इंडिया म्यूजिक समिट शुरू हुआ। इस दौरान म्यूजिक समिट के मेंटर लेखक और गीतकार प्रसून जोशी ने पत्रिका एंटरटेनमेंट से विशेष बातचीत की।
सच्चे सुरों का सफर
प्रसून जोशी ने कहा तीन साल पहले तीन साल पहले शुरू हुआ। जितने भी गुणीजनों से मेरी चर्चा होती थी तो सदैव यह सोचता था कि बस एक सच्चा सुर मिल जाए। यह एक साधना है और अंतहीन सफर है। हमने सोचा की इस यात्रा में हम भी चलते हैं।
शास्त्रीय संगीत को बढावा
हमारी कोशिश है कि फिल्मों के अलावा जो संगीत है, उसे भी बढावा मिले। ये बहुत लोग कहते रहते हैं कि संगीत के लिए काम कम हो रहा है। लेकिन करने की जब बारी आती है तो कम ही लोग सामने आते हैं। ऐसे में हमने संगीत के गुणीजनों और श्रोताओं को एक मंच पर लाने की सोची।
कानसेन की ज्यादा जरूरत:
साथ ही उन्होंने कहा,'तानसेन के साथ—साथ कानसेन का होना भी बेहद जरूरी है, अगर कानसेन नहीं होंगे तो फिर तानसेन के बारे में सोचने वाला कौन होगा।' उन्होंने जयपुरवासियों को भी कानसेन कहते हुए कहा कि उनकी बदौलत ही इंडिया म्यूजिक समिट सफलता की उंचाईयां छू रहा है।
रीक्रिएट किए गानों में मूल रूप जरूरी
प्रसून जोशी से जब गानों के रीक्रिएट करने पर सवाल पूछा तो उन्होंने कहा,'कई बार गानों को रीक्रिएट करने में उसका मूल रूप छूट जाता है। कई बार उसका प्रस्तुतिकरण भी गलत तरीके से किया जाता है।' साथ ही उन्होंने कहा,'आशा जी ने कहा था कि जो चीज बन चुकी है सुंदर, उसके साथ छेडछाड करना गलत है। लेकिन कई बार उसका प्रस्तुतिकरण अच्छा हो और मूल कलाकार की सहमति से हो तो अच्छा हो सकता है। साथ ही उन्होंने कहा कि गाने को रीक्रिएट करने से पहले उसके मूल आर्टिस्ट से भी पूछा जाना चाहिए और गाने के भाव और मूल रूप को बदला नहीं जाना चाहिए।'
Published on:
04 Oct 2019 04:56 pm
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