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वेब सीरीज ‘काली’ का दूसरा सीजन हुआ स्ट्रीम, पाओली डेम को पहचानिए

'काली' इनसे इस मामले में थोड़ी अलग है कि इसमें हिंसा का अतिरेक नहीं है। कहानी में भावनाओं पर जोर है और घटनाओं का ताना-बाना इस तरह बुना गया है कि देखने वालों में 'आगे क्या होगा' की बेताबी बनी रहती है।

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वेब सीरीज 'काली' का दूसरा सीजन आज से, पाओली डेम को पहचानिए

वेब सीरीज 'काली' का दूसरा सीजन आज से, पाओली डेम को पहचानिए

-दिनेश ठाकुर
ओटीटी कंपनी जी 5 पर पाओली डेम की बहुचर्चित वेब सीरीज 'काली' का दूसरा सीजन 29 मई से शुरू हो रहा है। इसका पहला सीजन बांग्ला में था। लोकप्रियता के कारण दूसरा सीजन हिन्दी में भी तैयार किया गया है। इन दिनों विभिन्न ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर हिंसा और अश्लीलता से भरपूर वेब सीरीज दिखाई जा रही हैं। 'काली' इनसे इस मामले में थोड़ी अलग है कि इसमें हिंसा का अतिरेक नहीं है। कहानी में भावनाओं पर जोर है और घटनाओं का ताना-बाना इस तरह बुना गया है कि देखने वालों में 'आगे क्या होगा' की बेताबी बनी रहती है।

क्राइम थ्रिलर 'काली' का किस्सा यह है कि मुसीबत से घिरे एक बच्चे को बचाने के लिए उसकी मां हर तरह के प्रतिकूल हालात का डटकर मुकाबला करती है। यह मुकाबला चाहे पुलिस से हो, जेल से भागे मुजरिम से या शाातिर ड्रग डीलर से। पहले सीजन के कलाकारों (राहुल बनर्जी, चंदन रॉय सान्याल, विद्या मालवदे) की टीम में इस बार अभिषेक बनर्जी भी जुड़ गए हैं, जो एक दूसरी वेब सीरीज 'पाताल लोक' में सीरियल किलर के किरदार को लेकर सुर्खियों में हैं।

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'काली' में पाओली डेम ने अपने किरदार को जिस सहजता से गहराई दी है, उससे फिल्मों में उनके लिए कुछ और दरवाजे खुल सकते हैं। वैसे कोलकाता में जन्मी 40 साल की यह अभिनेत्री कई बांग्ला फिल्मों के अलावा कुछ हिन्दी फिल्मों में भी नजर आ चुकी है। बॉलीवुड में उन्होंने निर्देशक विनोद अग्निहोत्री की 'हेट स्टोरी' (2012) से कदम रखा था। इस फिल्म में उन्होंने सेक्स वर्कर का किरदार अदा किया था, जो एक बड़ी कंपनी के मालिक के जुल्म का शिकार होती है। बाद में वे 'अंकुर अरोड़ा मर्डर केस' (2013) और 'यारा सिली सिली' (2015) में नजर आईं। बॉलीवुड में उनके अभिनय की कम और बोल्ड सीन की ज्यादा चर्चा हुई। इस बोल्डनेस को लेकर निर्देशक सतीश कौशिक की हॉरर-कॉमेडी 'गैंग ऑफ घोस्ट्स' में उन्हें एक आइटम गाने तक सीमित रखा गया।

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पाओली डेम को बॉलीवुड में उस तरह के किरदार नहीं मिले, जैसे उन्होंने बांग्ला फिल्मों में अदा किए। मसलन निर्देशक गौतम घोष (पार, पतंग, यात्रा) की 'कालबेला' (2009) और विमुक्ति जयसुंदरा की 'चत्रक' में वे समर्थ अभिनेत्री के तौर पर उभरी थीं। बॉलीवुड अगर बोल्डनेस से हटकर पाओली डेम की अभिनय-रेंज को समझ पाए तो हिन्दी सिनेमा को एक और नंदिता दास या कोंकोणा सेन शर्मा मिल सकती है।