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उन पैसों का हिसाब-किताब... शाहरुख खान
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पैसों की तंगी का सामना मुझे बहुत ज्यादा नहीं करना पड़ा है। मां बराबर मुझे पॉकेटमनी के पैसे देती रहती थीं। फिर सीरियल आदि में काम करके भी मुझे पैसे मिलते रहते थे। लिहाजा दीवाली पर हम दोस्तों के साथ खूब मौज-मस्ती करते थे, लेकिन ना जाने क्यों दीवाली से पहले मुझे एक बड़ी खुशी का हमेशा इंतजार रहता था। मुझे याद है, दीवाली से पहले मुझे ऐसी ही एक बड़ी खुशी मिली थी, जब दीवाली से दो-तीन माह पहले मैंने जीपी सिप्पी साहब की फिल्म राजू बन गया जेंटिलमैन साइन की थी। इसके साइनिंग अमाउंट से मैंने दीवाली के मौके पर अपने दोस्तों को खूब उपहार खरीद कर दिए थे। गौरी को उसका पसंदीदा ड्रेस खरीद कर दिया था। दीवाली हमेशा ही मेरा फेवरेट फेस्टिवल रहा है। इस मौके पर मैं खूब खुशियां बटोरता हूं। राजू भले ही मेरी पहली रिलीज फिल्म नहीं थी, पर यह मेरी पहली साइन की हुई फिल्म थी। आज भी दीवाली के दिन इस फिल्म से मिले पैसों की याद आ जाती है और मैं फिर से उन पैसों का हिसाब-किताब करने लगता हूं। तब लगता है मेरे द्वारा कमाए गए अब तक के सारे पैसों का उपयोग इससे अच्छा कभी नहीं हुआ था, क्योंकि तब मैं बहुत ज्यादा सपन्न नहीं था, बावजूद इसके मैंने खुले मन से दीवाली पर इन पैसों को अपने लोगों पर खर्च किया था।
मैं बहुत खुले हाथ से खर्च करती हूं: कंगना
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मौका यदि दीवाली का हो, तो खर्च करने के मामले में आप आगे-पीछे कुछ नहीं देखते हैं। वैसे भी मैं बहुत खुले हाथ से खर्च करती हंू। मुझे याद है पांच-छह साल पहले एक एड फिल्म के लिए मुझे चालीस हजार रुपए का एक चैक मिला था। मुझे इससे पहले छोटे-मोटे इंडोर्समेंट के लिए सामान्य राशि के चैक मिलते ही रहते थे, पर इतना बड़ा अमाउंट मुझे कभी नहीं मिला था। मंैने कई दिनों तक यह राशि खर्च नहीं की थी। इसे खर्च करने के बारे में सोचती रही। दीवाली एक माह बाद आने वाली थी। मंै अपनी फैमिली को बहुत मिस कर रही थी, इसलिए मैंने यह तय किया कि दीवाली पर यह सारा पैसा उन पर खर्च करूंगी। मंैने मम्मी-डैडी और भाई-बहन के लिए कपड़े आदि खरीदे और जाने की तैयारी करने लगी, पर दीवाली से ठीक एक दिन पहले मेरी शूटिंग निकल आई। मेरे कुछ दोस्तों ने घर पर दीवाली मनाने की यह खुशी देखी थी, इसलिए उन्होंने सुझाव दिया कि मै शूटिंग की परवाह ना करके दो-चार दिन में परिवार से मिलकर चली आऊं, शूटिंग और काम तो हमेशा चलता रहता है। इसके बाद तो मैंने पूरी तरह बेफ्रिक होकर हिमाचल के अपने घर में जाकर दीवाली को एंजॉय किया। यहां आई, तो पता चला कि दीवाली से पहले होने वाली मेरी शूटिंग कैंसिल हो गई थी। वो लोग मेरा ही इंतजार कर रहे थे। सच, जब आप साथ खुशियां मनाने के बारे में सोचते हैं, तो सब कुछ आसान होता चला जाता है। कुछ ऐसी ही खुशी मुझे तब मिली थी, जब मेरी गैंगस्टर हिट हुई थी, मैंने पूरे दो माह पैसे को बचा कर रखा था, ताकि फिर घर जाकर शानदार दीवाली मना सकूं। हां, तंगहाली की अपनी कुछ दीवाली को मैं आज भी भूल नहीं पाई हूं। असल में जब स्ट्रगल कर रहे होते हंै, तो पैसे का मोल कुछ ज्यादा बढ़ जाता है।
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आधे पैसे मां-बाबूजी को भेज दिए थे : मनोज बाजपेई
दूसरे कई कलाकारों की तरह मेरे भी कॅरियर के कई साल बहुत स्ट्रगल में बीते हैं। इस दौरान जोरदार दीवाली मनाने का मौका बहुत कम मिला था। पहली बार फिल्म ‘सत्या’ ने मुझे यह खुशी दी थी। इस फिल्म के लिए साइनिंग अमाउंट के तौर पर मुझे 25 हजार रुपए मिले थे, जो उस समय मेरे लिए पच्चीस लाख के बराबर थे। उनमें से आधे से ज्यादा रुपए मैंने दीवाली पर अपने मां-बाबूजी को भेज दिए थे। अपने लिए कुछ अच्छे कपड़े लिए थे... कुछ स्ट्रगलर दोस्तों को आर्थिक मदद की थी। सत्या इसलिए भी मेरे लिए अहम है, क्योंकि यह एक जबरदस्त सफल फिल्म के रूप में सामने आई थी। इस फिल्म ने मुझे ज्यादा आर्थिक लाभ नहीं दिया था, पर कम-से-कम मेरे कॅरियर को खुशहाल बनाने में इसका अहम योगदान रहा है। जीवन में छोटी-छोटी खुशियां बहुत मायने रखती हैं। जेब में पैसे ना हों, तो कैसी दीवाली? आज भी दीवाली से पहले किसी बड़ी खुशी का इंतजार रहता है। जैसे कि इस साल राजनीति की भारी सफलता और उसमें मेरे काम की तारीफ ने मुझे दोहरी खुशी दी है। फिर मेरे यहां एक नया मेहमान आने वाला है, यह भी मेरे लिए एक बड़ी खुशी की बात है। जाहिर है इतनी सारी खुशियों के साथ हमारे परिवार की इस दीवाली की रंगत और बढ़ जाएगी।
Published on:
18 Oct 2017 02:16 pm
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