
कभी ऋषि कपूर की आवाज थे शैलेंद्र सिंह, गुमनामी के लिए खुद को मानते हैं जिम्मेदार
मुकेश के देहांत पर राज कपूर ने कहा था- 'मेरी आवाज चली गई।' ऋषि कपूर के देहांत पर इसी तरह की बात शैलेंद्र सिंह नहीं कह सके। वर्ना जिस तरह मुकेश को राज कपूर की आवाज कहा जाता था, उसी तरह कभी शैलेंद्र सिंह फिल्मों में ऋषि कपूर की आवाज हुआ करते थे। दोनों हमउम्र थे और दोनों का सितारा 'बॉबी' से बुलंद हुआ था। 'बॉबी' से शोमैन राज कपूर की फिल्म बनाने की शैली ही नहीं बदली, उनकी संगीत-परंपरा भी पूरी तरह बदल गई। 'बरसात' से 'मेरा नाम जोकर' तक उनकी फिल्मों में संगीत का जिम्मा संगीतकार शंकर-जयकिशन, गीतकार शैलेंद्र और हसरत जयपुरी ने संभाला था।
'बॉबी' में यह जिम्मेदारी संगीतकार लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल, गीतकार आनंद बख्शी, इंद्रजीत सिंह तुलसी और विट्ठलभाई पटेल ने अदा की। उस दौर में मोहम्मद रफी, किशोर कुमार और मुकेश की आवाजों का जादू सिर चढ़कर बोल रहा था, लेकिन राज कपूर इस फिल्म में ऋषि कपूर के लिए नई आवाज चाहते थे। फिल्म एंड टीवी इंस्टीट्यूट से एक्टिंग के कोर्स के बाद उन दिनों शैलेंद्र सिंह संगीत भी सीख रहे थे। एक परिचित के जरिए वे पहले लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल, बाद में राज कपूर से मिले और बतौर गायक चुन लिए गए।
'बॉबी' के 'मैं शायर तो नहीं', 'झूठ बोले कौवा काटे', 'हम तुम एक कमरे में बंद हों', 'मुझे कुछ कहना है' और 'न चाहूं सोना-चांदी' ने शैलेंद्र सिंह की आवाज घर-घर पहुंचा दी। अपनी पहली ही फिल्म के लिए उन्होंने सर्वश्रेष्ठ गायक का फिल्मफेयर अवॉर्ड भी जीता। बाद में ऋषि कपूर के लिए उन्होंने 'तुमको मेरे दिल ने पुकारा है' (रफूचक्कर), 'हमने तुमको देखा' (खेल खेल में), 'रंगीला हूं मैं दिल का' (रंगीला रतन) और 'शाम सुहानी आई' (जिंदा दिल) जैसे कुछ और गाने गाए। उन्हीं दिनों शैलेंद्र सिंह पर एक्टर बनने की धुन सवार हुई। 'दो जासूस' (1975) और 'एग्रीमेंट' (1980) में वे बतौर नायक नजर आए। दोनों फिल्में फ्लॉप रहीं। एक्टिंग की धुन में वे गायन पर पूरा ध्यान नहीं दे पाए। तब तक ऋषि कपूर के लिए किशोर कुमार और मोहम्मद रफी के अलावा दूसरी आवाजों का इस्तेमाल होने लगा था। दो नावों की सवारी के चक्कर में शैलेंद्र सिंह का सिक्का बतौर गायक भी ज्यादा देर तक कायम नहीं रहा। बाद में ऋषि कपूर के लिए 'होगा तुमसे प्यारा कौन' (जमाने को दिखाना है), 'रंग जमाके जाएंगे' (नसीब), 'जाने दो ना' (सागर) और 'जयपुर से निकली गाड़ी' (गुरुदेव) जैसे कुछ गाने गाकर वे ऐसे गुम हुए कि फिल्म वालों को भी उनका अता-पता नहीं रहा।
अपनी गुमनामी के लिए शैलेंद्र सिंह खुद को जिम्मेदार मानते हैं। उनका कहना है कि कभी वे आईना खूब देखा करते थे। इसी आदत से उन पर एक्टर बनने की धुन सवार हुई, जिसने उनके गायन-कॅरियर पर ग्रहण लगा दिया। अब वे 67 साल के हो चुके हैं। इस उम्र में यह बात उनके दिल में बड़ी टीस पैदा करती है कि नई पीढ़ी उनके गाने तो शौक से सुनती है, लेकिन उनके नाम से वाकिफ नहीं है। यह वक्त का सितम नहीं तो और क्या है कि 'गुंचे लगे हैं कहने' (तराना), 'राम करे कि उमर कैद हो जाए' (आदत से मजबूर), 'पुरवैया लेके चली मेरी नैया' (दो जासूस), 'फ्रेनी ओ फ्रेनी' (खट्टा मीठा), 'कई दिन से मुझे' (अंखियों के झरोखों से) और 'जीना ये कोई जीना तो नहीं' (एग्रीमेंट) जैसे लोकप्रिय गानों के गायक का नाम मालूम करने के लिए नई पीढ़ी गूगल का सहारा लेती है।
Published on:
11 May 2020 11:02 pm
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