राजस्थान के झुंझुनू जिले में अपने ननिहाल में जन्मीं मुबारक बेगम के पिता की माली हालत ठीक नहीं थी। चूंकि मुबारक की खुशकिस्मती थी कि उनके पिता को संगीत से गहरा लगाव था। मुबारक के दादाजी अहमदाबाद में चाय बेचते थे। जब मुबारक छोटी थीं, तभी उनके माता-पिता अहमदाबाद शिफ्ट हो गए। वहां उन्होंने फल बेचने का काम शुरू कर दिया, लेकिन अपने संगीत के शौक को मरने नहीं दिया।

इसके कुछ दिनों बाद मुबारक के पिता अपने पूरे परिवार को लेकर मुंबई आ गए। यह 1946 का दौरा था, जब बॉलीवुड में नूरजहां और सुरैया के आवाज का जादू चलता था। मुबारक इन दोनों गायिका को फॉलो करती थीं। उनके गाने बड़े शौक से गुनगुनाती थीं। एक पिता अपनी बेटी के हुनर को भांप लिया और मुबारक को संगीत की विधिवत तालीम के लिए किराना घराने के उस्ताद रियाजदुदीन खां और उस्ताद समद खां की शागिर्दी में शामिल कर दिया। इनके सानिध्य में देखते देखते मुबारक की आवाज सध गई। उसी दौरान मुबारक को ऑल इंडिया रेडियो पर ऑडिशन देने का मौका मिला। संगीतकार अजलीत मर्चेंट उनका ऑडिशन लिया। वो पास हो गईं। इस तरह रेडियो से उनके कॅरियर की शुरुआत हुई। घर-घर वो पहचानी जानी लगीं। उनकी आवाज के लोग मुरीद होने लगे। नतीजन यहीं से उनके लिए बॉलीवुड के दरवाजे खुले और उसके बाद तीन दशक तक बतौर प्लेबैक सिंगर मुबारक बेगम ने बॉलीवुड में छाई रहीं।