
गांव की लड़कियों को शहरी लड़कियों जैसी आजादी क्यों नहीं?' दुखती रग पर हाथ रखती है 'ख्याली पुलाव'
-दिनेश ठाकुर
फिल्म एक तीखे जुमले से शुरू होती है- 'लक्ष्मण रेखाएं खींचने से पहले अपने आप से पूछिए, क्या आप लक्ष्मण हैं?' हरियाणा के एक गांव के सरकारी स्कूल में पढऩे वाली आशा (प्रजाक्ता कोली) ( Prajakta Koli ) क्लास में टॉपर है। खेलों में उसकी दिलचस्पी नहीं है, लेकिन जब गणतंत्र दिवस के लिए स्कूल में हैंडबॉल मैच की तैयारियां शुरू होती हैं तो आशा की हर मुमकिन कोशिश रहती है कि उसे टीम में शामिल कर लिया जाए। मैदान में उसकी फिसड्डी प्रेक्टिस से मायूस कोच (यशपाल शर्मा) समझ नहीं पा रहे हैं कि इस पढ़ाकू लड़की पर खिलाड़ी बनने की धुन क्यों सवार है। उन्हें क्या पता कि गांव की लड़कियों के सुख-दुख की गणित बड़ी जटिल होती है। जैसा कि परवीन शाकिर ने कहा है- 'लड़कियों के दुख अजब होते हैं, सुख उससे अजीब/ हंस रही हैं और काजल भीगता है साथ-साथ।' एक खिलाड़ी के घायल होने पर आशा को एक्स्ट्रा खिलाड़ी के तौर पर टीम में शामिल करना पड़ता है। टीम मैच हार जाती है, लेकिन आशा बेहद खुश है कि खिलाड़ी के बहाने उसका टी शर्ट और शॉटर्स का सपना पूरा हो गया।
यह किस्सा है लेखक-निर्देशक तरुण डुडेजा की शॉर्ट फिल्म 'ख्याली पुलाव' का, जो हाल ही यूट्यूब पर जारी की गई है। करीब 26 मिनट की यह फिल्म हरियाणा की सरहदें पार कर पूरे ग्रामीण भारत की सामूहिक नारी-चेतना का प्रतीक बन जाती है। हरियाणा की खाप पंचायतें जिस तरह गांव की लड़कियों पर 'हद में रहने' के कायदे थोपती रहती हैं, उसी तरह दूसरे प्रदेशों से भी लड़कियों के खिलाफ फरमान की खबरें मिलती रहती हैं। तीन साल पहले धौलपुर (राजस्थान) के बल्दियापुर गांव की पंचायत ने लड़कियों के जीन्स पहनने और मोबाइल रखने पर रोक लगाने का फरमान जारी किया था।
'ख्याली पुलाव' हल्के-फुल्के अंदाज में इक्कीसवीं सदी के भारतीय समाज की दुखती रग पर हाथ रखती है। इस समाज में पुरुष और महिलाओं की समानता को लेकर लुभावने नारे रचना फैशन बन गया है, लेकिन शहर और गांवों की लड़कियों में समानता की बात नहीं होती। 'ख्याली पुलाव' ( Khayali Pulao short film ) में 'दंगल' ( Dangal ) के 'म्हारी छोरियां छोरों से कम है के?' के बदले अलग सवाल उठाया गया है- 'गांव की लड़कियों को शहरी लड़कियों जैसी आजादी क्यों नहीं?'
Published on:
15 Jul 2020 10:53 pm
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