
राधा कृष्ण
एक कुष्ठ रोगी अपने कुष्ठ रोग से अत्यधिक परेशान होकर, किसी की सलाह मान कर वृन्दावन आ गया। वह सड़क के किनारे बैठा रहता और आने जाने वाले हर व्यक्ति से अपने कुष्ठ रोग का उपचार पूछता। कोई कुछ दवाई बता कर चला जाता तो कोई कुछ, किन्तु किसी उपाय से भी उसका कुष्ठ रोग दूर न होता।
एक बार एक बड़े सरल-हृदय बाबा उधर से गुज़रे। उन्होंने उसकी दशा देख कर, द्रवित होकर कहा-'तुम सारा दिन यहाँ बैठे तो रहते ही हो, बस अपने मुख से हर समय 'श्री राधे-श्री राधे' का उच्चारण और कर लिया करो।'
अब उस कोढ़ी ने ऐसा ही किया, वह हर समय 'श्री राधे-श्री राधे' कहने लगा। उसके घावों में बहुत पीड़ा होती थी, तब भी हर समय करुण स्वर में 'श्री राधे-श्री राधे' कहता ही रहता।
श्री कृष्ण ने बृज की गलियों से गुज़रते हुये उसकी करुण वेदनामयी आवाज़ सुनी- जो उस समय भी 'श्री राधे-श्री राधे' की कररुण गुहार लगा रहा था।
भगवान 'राधे' उच्चारण सुनते ही उस ओर भागे। कोढ़ी के पास आकर श्री कृष्ण को ऐसा प्रतीत हुआ मानों वहाँ कोढ़ी न होकर राधा रानी बैठी हैं। उन्होंने तुरन्त उसे गले से लगा लिया और स्वयं भी भावविह्वल होकर राधे-राधे कहने लगे।
तभी पीछे से राधा रानी बोलीं-'प्रभु मैं तो इधर खड़ी हूँ उधर नहीं।' किन्तु भगवान को तो कोढ़ी में ही राधारानी दिख रहीं थीं। उन्होंने उसे ही कस कर पकड़े रखा और राधे-राधे कहते रहे।
कुछ क्षण पश्चात् जब प्रभु ने आँखें खोली तो देखा कि राधा रानी तो सत्य में उनके पीछे ही खड़ी थीं, किन्तु इतने ही क्षणों में भगवान की कृपा और स्पर्श मिलने से कोढ़ी भला-चंगा और पूर्णत: स्वस्थ हो चुका था।
सीख
जब पूर्ण श्रद्धा से कोई कार्य करते हैं तो सफलता जरूर मिलती है, भले ही वह किसी का नाम ही जपना क्यों न हो। जब हम अपने इष्टदेव का पूरी श्रद्धा और विश्वास के साथ पुकारते हैं ते वो जरूर आते हैं।
प्रस्तुतिः दीपक डावर
Published on:
17 Oct 2018 06:51 am
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