
बात तब की है जब मैंने बस से नया-नया सफर करना शुरू किया था। मैं सरकारी बस से नोएडा जा रही थी। बस जलपान के लिए गुन्नौर के एक ढाबे पर ररुकी। मौसम काफी सर्द था, "चाय चाय...गरममम् चाय्..." की लगातार आने वाली आवाजों ने मुझे चाय पीने पर विवश कर दिया। मैंने बस से उतरकर दस रुपये की चाय खरीदी और कुछ दूर लगे समोसे के ठेले की तरफ चल पङी ।
मुझे ज्ञात था बस बीस मिनट यहाँ रुकेगी, इसलिए मैंने भी चाय नाश्ता करने में कोई जल्दबाजी नहीं की। एकाएक मेरी आँखों में आँसू आ गये जब समोसे में पड़ा हरी मिर्च का टुकड़ा मेरे दाँतों के नीचे आया। मैंने नजर दौड़ाई। दूर एक हैंडपम्प मुझे दिखाई दिया। मैं तेज कदमों से वहाँ पहुँची। पानी पीने के पश्चात मैं अपनी बस की ओर चल पड़ी। इन कुछ क्षणों में वहाँ अनेक बस आ खड़ी हुईं थीं । रंग रूप में सब एक जैसी ही तो थीं और दिल्ली भी जा रहीं थीं। हाँ यही कारण था कि मैं अपनी बस को पहचान न सकी। एक दो बस में तो मैं अजनबी शक्लों को देखकर नीचे उतर आयी थी। अब माथे पर शिकन के साथ साथ पसीना भी था। अभी-अभी मैने एक बस को वहाँ से जाते देखा था "कहीं वो मेरी बस तो नहीं" इस विचार ने मुझे झकझोर के रख दिया, मेरा बैग भी तो बस में ही था।
मैं वहाँ हताश खड़ी उस जाती हुई बस को देख ही रही थी कि पीछे से किसी ने मुझे आवाज दी। मैंने मुड़कर देखा तो एक बस के गेट पर खड़े व्यक्ति ने मुझे वहाँ आने का अनुरोध किया। मैं वहाँ पहुँची "बस चलने वाली है मैडम" उसने मुझसे कहा। मैंने उसे गौर से देखा, हाँ ये वही व्यक्ति है जो बस में मेरी पास वाली सीट पर बैठा था। मैं बस में चढ़ी और पीछे सीट पर अपना बैग रखा पाया। मैं जाकर अपनी सीट पर बैठ गयी और चैन की साँस ली। मैंने मन ही मन उस व्यक्ति का शुक्रिया अदा किया और ईश्वर को भी धन्यवाद बोला। बस कुछ ही देर में चल पड़ी।
सीख
उस रोज माँ से बात करने के पश्चात मुझे ज्ञात हुआ कि बस का नम्बर मुझे मालूम होना चाहिए था। वह मेरे लिए एक सीख थी। इस घटना के माध्यम से मैं सभी को यही बताना चाहती हूँ कि जीवन में होने वाले हर छोटी बड़ी भूल या घटना हमें सीख देती है। अर्थात अपनी गलतियों से सीखने का प्रयास करिए और कोशिश करिए कि एक गलती को आप अपने जीवन में दोबारा ना दोहरायें ।
प्रस्तुतिः रक्षिता सिंह
Updated on:
11 Nov 2018, 8:08 AM IST
Published on:
11 Nov 2018, 7:52 AM IST
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